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Romance काला इश्क़!
update 15 (2)

मेरी आँखें नम हो चलीं थीं, पर आंसुओं को मैंने बाहर छलकने नहीं दिया और खुद को संभालते हुए मैं उठ के खड़ा हुआ और बाथरूम में मुँह धोने घुसा| जब बाहर आया तो ऋतू मायूस थी; "जानू! आप मुझसे नाराज हो?"  मैंने ना में सर हिलाया तो वो खुद आ कर मेरे गले लग गई| आगे हम कुछ बात करते उससे पहले ही बॉस का फ़ोन आ गया और वो मुझसे कुछ पूछने लगे| इधर ऋतू ने मेरे बैग में कपडे सेट कर के रख दिए थे और खाने के लिए सैंडविच बना रही थी| बॉस से बात कर के मैं वहीँ पलंग पर बैठ गया और मन ही मन ये उम्मीद करने लगा की ऋतू अभी गर्भवती ना हो जाये| मेरी चिंता मेरे चेहरे से झलक रही थी तो ऋतू मेरे सामने हाथ बांधे कड़ी हो गई और मेरी तरफ बिना कुछ बोले देखने लगी| मैं अपनी चिंता में ही गुम था और जब मैंने पाँच मिनट तक कोई प्रतिक्रिया नहीं दी तो वो मेरे नजदीक आई, अपने घुटने नीचे टिका कर बैठी और मेरी ठुड्डी ऊपर की| "क्यों चिंता करते हो आप? कुछ नहीं होगा! आप बस जल्दी आना, मैं यहाँ आपका बेसब्री से इंतजार करुँगी|" इतना कह कर उसने मेरे होठों को चूमा और मेरे निचले होंठ को चूसने लगी| मैंने जैसे-तैसे खुद को संभाला और ऋतू के होठों को चूसने लगा| दो मिनट बाद मैं उठ खड़ा हुआ, अपने कपडे बदले और फिर ऑटो कर के पहले ऋतू को हॉस्टल छोड़ा| फिर उसी ऑटो में मैं स्टेशन आ गया, पर ऋतू मेरी चिंता भाँप गई थी इसलिए उसने आधे घंटे बाद ही मुझे कॉल कर दिया| पर ये कॉल उसने अपने मोबाइल से नहीं बल्कि मोहिनी के नंबर से किया था; 

मैं: हेल्लो?

ऋतू: आप पहुँच गए स्टेशन?

मैं: हाँ... बस अभी कुछ देर हुई|

ऋतू: अकेले हो? कुछ बात हो सकती है?

मैं: हाँ बोलो?

ऋतू: वो मुझे आपसे कुछ पूछना था, एकाउंट्स को ले कर|

और फिर इस तरह उसने मुझसे सवाल  पूछना शुरू कर दिए| पार्टनरशिप एकाउंट्स में उसे JLP पर डाउट थे| हम दोनों बात ही कर रहे थे की वहाँ सर और मैडम आ गए| अब चूँकि वो मेरे पीछे से आये थे तो उन्होंने मेरी JLP को लेके कुछ बातें सुन ली थी और वो ये समझे की मैं अपने स्टूडेंट से बात कर रहा हूँ| जिस बेंच पर मैं बैठा था उसी पर जब उन्होंने सामान रखा तो मैं चौंक गया और ऋतू को ये बोलके फ़ोन काट दिया की मैं थोड़ी देर बाद कॉल करता हूँ|

अनु मैडम: अरे! तुम तो ऑन-कॉल भी पढ़ाते हो?

ये सुन कर मैं और मैडम दोनों हँसने लगे पर सर को ये हँसी फूटी आँख न भाई|

सर: अच्छा मानु सुनो, मैं नहीं जा पाउँगा तो ऐसा करो तुम और अनु चले जाओ| वहाँ से तुम्हें अँधेरी वेस्ट जाना है, वहाँ तुम्हें Palmer Infotech जाना है जहाँ पर एक टेंडर के लिए मीटिंग रखी गई है| PPTs मैं तुम दोनों को मेल कर दूँगा, ठीक है? राखी तुम दोनों को वहीँ मिलेगी|

मैंने जवाब में सिर्फ हाँ में गर्दन हिलाई और सर ने मुझे टिकट का प्रिंटआउट दे दिया| इतना कह कर सर चले गए और मैडम और मैं उसी बेंच पर बैठ गए| मैडम ने तो कोई नावेल निकाल ली और वो उसे पढ़ने लगी और इधर ऋतू ने फिर से फ़ोन खनखा दिया और मैं थोड़ी दूर जा कर उससे बात करने लगा| जब मैंने उसे बताया की मैडम और मैं एक साथ जा रहे हैं तो वो नाराज हो गई|

ऋतू: आपने तो कहा था सर जा रहे हैं तो ये मैडम कहाँ से आईं?

मैं: यार वो बॉस की वाइफ हैं, कुछ काम से वो नहीं जा रहे इसलिए उन्हें भेजा है|

ऋतू: What’s her name?
मैं: अनु मैडम


ऋतू: Age?

मैं: I don’t know… maybe 30, 35… I don’t know! (मैंने झुंझलाते हुए कहा|)

ऋतू: How does she look like?

मैं: What?

ऋतू: I mean her figure, bust size etc!

मैं: Are you mad? She’s my boss’s wife.

ऋतू: वो सब मुझे नहीं पता, दूर रहने उससे|

मैं: ओह हेल्लो मैडम! मैं उनके साथ ऑफिस ट्रिप पर जा रह हूँ घूमने नहीं जा रहा|

ऋतू: जो तो उसी के साथ रहे हो ना?

मैं: पागल जैसे तुम सोच रही हो वैसा कुछ भी नहीं हैं| वो बस मेरी बॉस है!

ऋतू आगे कुछ बोलने वाली थी पर फिर चुप हो गई और फ़ोन रख दिया| साफ़ था वो जल भून कर राख हो गई थी| मैं वापस बेंच पर बैठने जा रहा था की उसने मुझे वीडियो कॉल कर दिया| मैंने क्योंकि हेडफोन्स पहने थे तो मैंने कॉल उठा लिया|

ऋतू: मुझे देखन है आपकी अनु मैडम को?!

मैं: तू पागल है क्या? किसी ने देख लिया तो?

ऋतू: आपको मेरी कसम!

मैंने हार मानते हुए चुपके से दूर से ऋतू को अनु मैडम का चेहरा दिखाया| ठीक उसी समय मैडम ने मेरी तरफ देखा और हड़बड़ी में मैंने कॉल काट दिया| पर मैडम को लगा की मैं सेल्फी ले रहा हूँ इसलिए उन्होंने बस मुस्कुरा दिया|ऋतू ने आग बबूला हो कर दुबारा कॉल किया और मुझ पर बरस पड़ी;

ऋतू: ये किस एंगल से मैडम लग रही हैं? ये तो मॉडल हैं मॉडल! मैं ना..... आह! (ऋतू गुस्से में चीखी|)

मैं: जान! एक टेंडर के लिए....

ऋतू: (मेरी बात काटते हुए) उससे दूर रहना बातये देती हूँ! वरना उसका मुँह नोच लुंगी!

इतना कह कर उसने फ़ोन काट दिया| मुझे उसकी इस नादानी पर प्यार आ रहा था और मैंने उसे दुबारा फ़ोन किया और उसके कुछ बोलने से पहले ही मैंने उसे फ़ोन ओर एक जोरदार "उउउउम्मम्मम्मम्माआआअह्ह्ह्हह" दिया| ये सुनते ही वो पिघल गई और मैंने उसे यक़ीन दिला दिया की उसे चिंता करने की कोई जर्रूरत नहीं है| मुझ पर सिर्फ और सिर्फ उसका अधिकार है!
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update 16 

ऋतू से बात करके मैं वापस बेंच पर बैठ गया और फ़ोन में गेम खेलने लगा, मेरे और मैडम के बीच अब भी कोई बातचीत नहीं हो रही थी| कुछ देर बाद ट्रैन आ गई और प्लेटफार्म पर लग गई, पर दिक्कत ये थी की मेरी टिकट कन्फर्म नहीं थी और मैडम वाली टिकट कन्फर्म तो हुई पर वो सर के नाम पर थी| कंजूस सर ने स्लीपर की टिकट बुक की थी, जबकि फर्स्ट ऐ.सी. में टिकट्स खाली थी| लखनऊ से मुंबई की 32 घंटे की यात्रा वो भी बिना कन्फर्म टिकट के, ये सोच कर ही थकावट होने लगी थी मुझे| जैसे-तैसे मैंने मैडम का बैग तो उनकी सीट पर रख दिया और मैं इधर-उधर जा कर कोई खाली सीट खोजने लगा| दूसरे कोच में मुझे एक सीट खाली मिली और मैं उधर ही अपना बैग ले कर बैठ गया| करीब पंद्रह मिनट बाद मुझे मैडम का कॉल आया;

अनु मैडम: मानु? कहाँ हो तुम?       

मैं: जी...मैं S2 में हूँ, वहाँ कोई सीट खाली नहीं थी इसलिए|

अनु मैडम: अरे गाडी चलने वाली है, आप जल्दी आओ यहाँ!

मुझे बड़ा अजीब लगा पर मैंने उनसे कोई बहस नहीं की और उठ कर चल दिया| अब मैं जहाँ बैठा था वहाँ शायद मुझे बर्थ मिल भी जाती पर मैडम ने बुलाया तो मुझे अपनी विंडो सीट छोड़के मैडम के पास वापस जाना पड़ा| जब में S1 कोच में पहुँचा तो देखा वहाँ दो हट्टे-कट्टे आदमी मैडम की बर्थ पर बैठे हैं, तब मुझे समझ आया की वो क्या कह रहीं थी| मैं वहाँ पहुँचा तो मुझे देखते ही वो दोनों आदमी समझे की मैं मैडम का बॉयफ्रेंड हूँ और उनमें से एक उठ कर कहीं चला गया| में ठीक मैडम की बगल में बैठ गया पर मेरे और उनके जिस्म के बीच गैप था| "ये बैग आप सीट के नीचे रख दो|" मैडम ने कहा तो मैंने वैसा ही किया और चुप-चाप दूसरी खिड़की से बाहर देखने लगा| ट्रैन चल पड़ी और इधर मैडम मेरे बिलकुल नजदीक आ गईं और मेरे कान में खुसफुसाईं; "आपकी सीट कन्फर्म हुई?" मैं उनकी इस हरकत से चौंक गया और मैंने ना में सर हिलाया| "TTE से बात करें?" मैडम ने कहा तो मैंने हाँ में सर हिलाया| मैडम के इतना करीब आने से मुझे उनके परफ्यूम की महक आने लगी थी और वो बहुत जबरदस्त थी| मदहोश कर देने वाली, पर ये ऋतू का प्यार था जो मुझे बहकने नहीं दे रहा था| कुछ देर बाद TTE आया और उसे देखते ही वो आदमी जो मेरी बगल में बैठा था उठ के भाग खड़ा हुआ| मैडम ने चुपके से मेरे हाथ में 500 के चार नोट पकड़ा दिए थे और मुझे ये देख कर बहुत हैरानी हो रही थी| इधर TTE ने जब हम से टिकट माँगी तो मैंने उसे टिकट दिखाई तो वो बोला की; "मानु कौन है?" मैंने हाँ में सर हिला कर बताया| फिर उसने कहा; "आप मैडम किसी और की टिकट पर सफर कर रही हैं?" अब मुझे कैसे भी बात संभालनी थी, तो मैंने ही कहा; "सर वो दरसल एक गड़बड़ हो गई थी, मैंने मैडम की जगह सर का नाम लिख दिया था? आप चाहे तो देख लीजिये मैडम का PAN Card उसमें इनके हस्बैंड का नाम वही है जो टिकट में लिखा है|”  वो तुरंत मेरी चालाकी भाँप गया और बोला; "बेटा, चलो तुमने नाम गलत भरा पर लिंग भी गलत भर दिया? महिला को पुरुष लिख दिया?" अब ये सुन कर तो सब हँस पड़े| उन्होंने हँसते हुए कहा; "कोई बात नहीं, पति की टिकट पर पत्नी ही तो सफर कर रही है|" अब वो जाने लगा तो मैडम ने ही उन्हें रोका; "सर दो मैं से एक ही टिकट कन्फर्म हुई है आप प्लीज देख लीजिये एक और टिकट कन्फर्म हो जाए?"

"सॉरी मैडम पर सिवाए फर्स्ट ऐ.सी. के सारे फुल हैं| कहो तो मैं फर्स्ट ऐ.सी. की दो टिकट बना दूँ?" अब ये सुन के तो मैं ने सोचा की भाई ये 32 घंटे बैठे-बैठे ही निकलेंगे| पर मैडम तपाक से बोलीं; "ठीक है TTE साहब आप दो टिकट बना दीजिये|" अब ये देख मैं हैरानी से मैडम को देखने लगा| उसने मैडम से 7800/- माँगे, तो मैडम ये सुन कर थोड़ा सोच में पड़ गईं| अब मैं उठ खड़ा हुआ और TTE साहब को थोड़ा मस्का लगाने लगा और उन्हें थोड़ा दूर ले जा कर कहा; "सर प्लीज थोड़ा रहम करो! देखो यही टिकट लेनी होती तो मैं बुक करा देता| कुछ तो कन्सेशन करो? मैं अयोध्या रहता हूँ, आपको कुछ भी काम हो तो आप कहना| प्लीज सर!" अब ये सुन कर वो थोड़ा तो नरम हो गया| "अरे तुम तो हमारे गाँव वाले निकले!" ये कहते हुए हमारी बातें शुरू हुई, फिर मैने उसकी बात अपनी पिताजी से करवाई और तब पता चला की ये मेरे दोस्त संकेत तिवारी के छोटे चाचा हैं| उन्होंने  मुझसे मेरा मोबाइल नंबर लिया और अपना नंबर भी दिया और फिर दो टिकट भी बना दिए जब पैसे की बात आई तो उन्होंने कहा है जो मन करे वो दे दो| मैंने दो हजार मैडम वाले और हजार अपनी जेब से उन्हें दे दिए और वो आगे चले गए| वापस आ कर मैंने मैडम से कहा की हमें आगे जाना है, इधर मैडम भी होशियार निकली उन्होंने 500/- में अपनी टिकट एक आंटी को बेच दे दी| हम फर्स्ट ऐ.सी में अपने कम्पार्टमेंट में घुसे तो अंदर घुसते ही मैडम घबरा गईं| अंदर दो लौंडे बैठे थे और शक्ल से ही चरसी लग रहे थे| मैडम की घबराहट उनके चेहरे से ही झलक रही थी तो मुझे ही आगे आना पड़ा| मैंने मैडम को बहार रुकने का इशारा किया और सामान उठा कर सीट के नीचे डाला और फिर उन्हें अंदर आने को कहा| जैसे ही दोनों ने मैडम को देखा तो ठरक्पना उनके चेहरे पर आ गया और उनकी शक़्लें देख मैं गंभीर हो गया| "आप दोनों झाँसी जा रहे हैं?" उनमें से एक ने बात शुरू की तो मैंने जवाब देते हुए नहीं कहा और बात आगे बढे उसके पहले ही मैडम मुझसे सट कर बैठ गईं और खिड़की के बाहर देखने लगीं| फिर मेरी तरफ मुँह कर के धीमी आवाज में बोलीं की उन्हें भूक लगी है| उनका व्यवहार अचानक से गर्लफ्रेंड वाला हो गया था और मुझसे इससे बहुत अनकम्फर्टेबले महसूस हो रहा था| मैंने बैग से ऋतू के पैक किये हुए सैंडविच निकला और उन्हें दे दिया| वो बाहर मुँह कर के खाने लगीं, इधर उन दोनों कमीनों की नजर अभी भी उन पर टिकी हुई थी| मैं समझ सकता था की उन्हें कितना अनकम्फर्टेबले महसूस हो रहा है पर मैं इस समय कुछ नहीं कर सकता था, बस हर थोड़ी-थोड़ी देर में उन दोनों की हरकत पर नजर रखे हुए था| वो दोनों भी कभी फ़ोन में कुछ देखते, कभी एक दूसरे से बात करते और मेरी नजर बचा-बचा के अनु मैडम को देखते| मैडम उनकी सारी हरकतें कनखी नजरों से देख रही थी और गुस्सा उनके चेहरे पर झलक रहा था| उनमें से एक ने मैडम की तरफ देखते हुए अपने लंड पर हाथ रख दिया और उसे दबाने लगा| इससे पहले की मैं उसे कुछ कहता मैडम को अचानक से क्या सुझा की उन्होंने अपना सर मेरी जांघ पर रख दिया और उन दोनों की तरफ पीठ कर के लेट गईं| इससे पहले की वो मैडम को पीछे से देख पाते मैंने उनपर एक चादर डाल दी| पर मेरी हालत ख़राब हो गई थी, मैडम का सर मेरे लंड से कुछ सेंटीमीटर दूर था और उनकी सांसें मुझे उस पर साफ़ महसूस हो रही थी| लंड अब फुल ताव में अकड़ने लगा था और मुझे डर लग रहा था की अगर मैडम को ये महसूस हो गया तो वो मेरे बारे में क्या सोचेंगी| मैं मन ही मन उन कमीनों को गाली दे रहा था, न वो हरामी यहाँ होते और ना ही मैं इस परिस्थिति में फँसता| मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं अपने दोनों हाथों को कहाँ रखूँ? दायाँ हाथ तो मैंने अपने दायीं तरफ सीट पर रख लिया पर बायाँ हाथ कहाँ रखूँ? मैडम के सर पर रख नहीं सकता था और न ही उसे अपने बाएं घुटने पर रख सकता था| तो मैंने उसे मोड़ के अपने सर के पीछे रख लिया और पीछे तक लगा कर बैठ गया| मेरे मन में मैडम के लिए कोई गंदे विचार नहीं थे पर लंड का दिमाग तो होता नहीं, उसे गर्मी मिली नहीं की वो टनटनाते हुए अकड़ गया| इधर ये दोनों जल भून के राख हो चुके थे और मन ही मन मुझे गाली दे रहे होंगे की क्यों मैंने मैडम के जिस्म को ढक दिया| थोड़ी देर में ऋतू का फ़ोन आया और अब मैं अजब दुविधा में फँस गया था! अगर उठ के जाऊँ तो मैडम अकेली रह जाएँगी और ये भूखे भेड़िये कोई बदसलूकी न करें उनके साथ और यहाँ बैठा रहा तो फ़ोन पर बात कैसे करूँ| आखिर मैंने फ़ोन उठा लिया और हेडफोन्स कान में लगाए हुए ही उससे बात करने लगा, पर वो मेरी हालत समझ गई और पूछने लगी की मैं क्या कर रहूँ? मैंने बस 'कुछ नहीं' कहा, पर वो समझ गई और जोर देने लगी की मैं उसे बताऊँ तो मैंने उसे बस ये कह के टाल दिया की मैं "बाद में कॉल करता हूँ|" उसने फिर से मुझे कॉल कर दिया पर मैंने उठाया नहीं|

नौ बजे एक अटेंडें आया और उसने मुझसे खाने को पूछा तो मैंने उसे दो थाली बोल दी और सामने वाले एक लड़के ने भी दो थाली बोल दी| उनमें से एक बाहर गया हुआ था और जब वो आया तो उसकी आँखें सुर्ख लाल थी, मतलब साफ़ था की वो अभी माल फूँक कर आया है| मैंने अभी तक मैडम को छुआ नहीं था पर जब अटेंड खाना ले कर आया तो मुझे उन्हें उठाना था| अब मैं उनका नाम नहीं ले सकता था, भले ही वो उन दोनों को ये जता रहीं हों की हम दोनों पति-पत्नी हैं| उन्हें छू भी नहीं सकता था अब हार मानते हुए मैंने सोचा की उनकी दायीं बाजू को छू कर उन्हें उठाऊँ की तभी TTE वहाँ से गुजरे और उन्होंने हम दोनों को इस हालत में देख लिया| मेरी बुरी तरह फटी की अब मैं गया काम से पर उन्होंने कुछ नहीं कहा बस मुस्कुरा दिए और चले गए| मैंने मैडम के बाजू को थोड़ा हिलाया और उन्हें उठा दिया| वो उठीं और अपने होठों को पोछने लगी, मैंने अपनी पैंट पर देखा तो मेरे लंड के पास से गीली हो चुकी थी| सोते समय मैडम के मुँह से लार निकली थी जिसने मेरे लंड के पास गीला निशान बना दिया था| जब उनकी नजर वहाँ पड़ी तो वो बुरी तरह झेंप गईं और नजर चुरा कर बाथरूम चली गईं| इधर उन दोनों छिछोरों ने जब ये देखा तो वो भी गन्दी हंसी हँसने लगे| मैंने मैडम वाली चादर ही उठा ली और पैंट के ऊपर डाल ली| जब मैडम आ गईं तो मैं हाथ धोने जाने लगा तो मैडम मुझे देख कर फिर से शर्मा गईं और वापस सीट पर सर झुका कर बैठ गईं| मैं हाथ धो कर आया तो देखा वो दोनों हरामी खुसफुसा रहे थे; "देख रहा है?! मियाँ-बीवी का प्यार? इसीलिए कह रहा था की तू भी शादी कर ले!" मैं आगे कुछ बोलता उससे पहले ही मैडम ने इशारे से मुझे अपने पास बैठने को कहा और हम दोनों खाना खाने लगे|
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update 17 

खाना खाने के बाद भी उन कमीने लड़कों की नजरें मैडम पर बानी हुई थी और मैडम बस खिड़की से बाहर देखे जा रही थी| मुझे अब उन पर तरस आने लगा था और मैं मन ही मन सोचने लगा की क्या करूँ? मैंने अपने बैग से लैपटॉप निकाला और उसमें हेडफोन्स कनेक्ट कर के उन्हें दिया| वो हैरानी से मुझे देखने लगी पर जब मैंने उन्हें मूवी देखने को कहा तो वो मुस्कुरा दीं और मूवी प्ले करके देखने लगी| मैंने ऊपर से दो तकिये उतार के अदम को दे दिए जिन्हें मैडम ने अपनी गोद में एक के ऊपर एक रख लिया और सबसे ऊपर उन्होंने लैपटॉप रख लिया| इतनी ऊंचाई होगई थी की मैडम आराम से मूवी देख सकें और उन लड़कों की आँखों से अपने जिस्म को बचा सकें| अब तो वो दोनों मुझे देखने लगे की क्यों मैंने उनके हुस्न के दीदार में बाधा डाल दी| मैडम भी मेरी चालाकी समझ चुकी थी और उन्होंने मुझे नजर बचा के दबी आवाज में थैंक यू और मैंने बस हाँ में गर्दन हिला दी| मैं भी पाँव ऊपर कर के बैठ गया और ऋतू को मैसेज करने लगा| मैंने उसे अभी जो भी कुछ हुआ उसके बारे में कुछ नहीं बताया था वर्ण वो फिर कोई काण्ड कर देती| मैंने उसे सॉरी कहा की दरसल मैं उस समय मैडम से बात कर रहा था इसलिए फ़ोन नहीं उठा पाया पर वो मुझसे रूठ चुकी थी और थोड़ी ही देर में ऑफलाइन चली गई| मूवी देख कर मैडम हँस रही थी और उनकी हंसी मन्त्र-मुग्ध करने वाली थी पर मेरा दिल तो अब किसी और का हो चूका था| इतने साल से ऑफिस में काम कर रहा था पर मैडम को कभी इस तरह मैंने मुस्कुराते हुए नहीं देखा था| वो हमेशा ही ऑफिस में काम करती रहती थी और शायद ही कभी मुस्कुराईं हो! खेर अब चूँकि ऋतू मुझसे नाराज थी तो बात करने वाला कोई था नहीं मेरे पास, तो मैं बैठे-बैठे ऊबने लगा था| मैडम ने मेरी परेशानी भाँप ली और वो मेरे कंधे पर सर रख चिपक गईं और लैपटॉप को थोड़ा टेढ़ा कर लिया, हेडफोन्स का एक सिरा उन्होंने मुझे दे दिया| आज तक सिर्फ एक ऋतू थी जिसने कभी मेरे कंधे पर अपना सर रखा हो अब ऐसे में  मैडम के सर रखने से मुझे बहुत ही अजीब महसूस हो रहा था| वो दोनों लड़के मैडम के इस तरह से बैठने से आहें भरने लगे और मैंने गौर किया तो पाया की मैडम की एक जाँघ उन्हें दिखने लगी थी|  अब चूँकि मैडम ने चूड़ीदार पहना था और उनकी कुर्ती शॉर्ट थी तो उनके जिस्म का उभार उन्हें साफ़ दिख रहा था| मैंने मेरे बगल में पड़ी चादर को उठा के उन पर डाला और तब मैडम को एहसास हुआ की वो लौंडे क्या देख रहे थे और उन्हें बहुत मायूसी होने लगी| मैंने मूवी को फ़ास्ट-फॉरवर्ड कर के हँसी वाला सीन लगा दिया जिसे देख कर मैडम मुस्कुरा दी| वो समझ गईं थीं की मैंने ये सिर्फ उन्हें खुश करने के लिए किया था| रात के बारह बजे होंगे और अब मुझ पर नींद हावी होने लगी थी, अब मैडम तो सो चुकी थीं पर मुझे बड़ी जोर से नींद आ रही थी| मेरी उबासी सुन कर वो समझ गईं और उन्होंने मुझे अपनी गोद में सर रख कर लेटने को कहा तो मैं फिर से हैरान हो गया| मैंने ना में सर हिलाया और वैसे ही बैठा रहा, जेब से एक च्युइंग गम निकाली और चबाने लगा| रैपर मैंने जेब में डाल लिया, फिर मैडम ने भी एक गम माँगी तो मैंने उन्हें भी दे दी| उनका ध्यान मूवी में लगने से उनका अनकम्फर्टेबले लेवल कम हो चूका था|


रात एक बजे गाडी झाँसी पहुँची और ये दोनों लौंडे अपना सामान ले कर उत्तर गए और तब जा कर मैडम का सर मेरे कंधे से उठा| उनके जाते ही दो ऑन्टी केबिन में घुसीं और सामने वाली बर्थ पर बैठ गईं और अपना सामान सेट करने लगीं| मैंने भी मैडम से ऊपर जा के सोने की इजाजत माँगी तो उन्होंने हँसते हुए इजाजत दे दी| सामने वाली एक आंटी भी हँसने लगी| मैंने चादर बिछाई और लेट गया और घोड़े बेच के सो गया| पौने तीन बजे मैडम ने मुझे उठाया तो मैं चौंक कर उठ गया; "सॉरी मानु! वो मुझे ....जाना है|" मैं तुरंत समझ गया की उन्हें वाशरूम जाना है और इतनी रात को ट्रैन में उन्हें अकेले जाने से डर लग रहा है| मैं जूते पहनके उनके साथ बाथरूम तक गया और फिर वापस उन्ही के साथ आ गया| वापस आने के रास्ते में वो शर्मिंदा महसूस कर रहीं थीं पर मैंने ''its alright mam, I can understand.” कह के बात खत्म कर दी| सुबह 8 बजे मैं उठा और अभी इटारसी स्टेशन आया था और अटेंड चाय ले कर आया था| मैडम ने उसे रात के खाने और चाय के पैसे दिए और मैं भी नीचे उतर आया|

फ्रेश हो कर मैं चाय पीने लगा;

अनु मैडम: वो टिकट कितने की थी?

मैं: 3,०००/- की| (मैंने चाय की चुस्की लेते हुए कहा|)

अनु मैडम: वो तो 8,०००/- माँग रहा था?

मैं: वो दरसल उनसे बात की तो पता चला की वो मेरे ही गाँव के हैं और मेरे ही दोस्त के चाचा हैं|

अनु मैडम: आपका गाँव कहाँ है?

मैं: अयोध्या

अनु मैडम: अरे वाह! कभी बताया नहीं आपने?

मैं: जी कभी टॉपिक ही नहीं छिड़ा| पर मैडम सर को पता चला तो वो बहुत गुस्सा होंगे?

अनु मैडम: उन्हें बोलने की कोई जर्रूरत नहीं| उन्हें जरा भी समझ नहीं है, बस सारा टाइम हुक्म चलाते रहते हैं| अचनक से मुझे कहा की तुम चली जाओ, भला ये कोई बात हुई?

उन्हें सर पर बहुत गुस्सा आ रहा था और मैं उनकी किसी भी बात का जवाब हाँ या नहीं में दे रहा था बस चुप-चाप सुने जा रहा था| दस मिनट तक उनके मन की भड़ास निकलती रही और मैं सर झुकाये सुनता रहा की तभी वो दोनों आंटी आ गईं जो फ्रेश होने गईं थी| उनके आते ही मैडम चुप हो गईं और मेरा सर झुका होने से उन्हें लगा की मैडम मुझे हिओ डाँट रही हैं| "अरे बेटा क्या हुआ? काहे झगड़ रहे हो?" पहली आंटी बोलीं|

"अरे मियाँ-बीवी तो ये खट-पट चलती रहती है|" ये कह के दूसरी आंटी हँसने लगी, और ठीक उसी समय वही TTE आ गया और उसने ये मियाँ-बीवी वाली बात सुन ली| अब इससे पहले मैं कुछ बोलता मैडम ही बोल पड़ी; "आंटी मैं झगड़ नहीं रही थी, आपके आने से पहले यहाँ दो छिछोरे बैठे थे और वो बस मुझे घूरे ही जा रहे थे|" मैं बिना कुछ बोले ही वहाँ से उठ के बाहर आ गया और ऋतू को फ़ोन करने लगा|

मैं: Good Morning जान!

ऋतू: जा के अपनी अनु मैडम को बोलिये|

मैं: यार... प्लीज .... बात तो....

ऋतू: बात भी आप जाके अनु मैडम से करिये| मुझे कॉलेज जाना है|

इतना बोल कर उसने कॉल काट दिया, मैं जानता था की वो फ़ोन पर नहीं मानने वाली| TTE ने पीछे से मेरी बातें सुन ली थी और वो आ कर मुझसे चुटकी लेने लगे; "लगे रहो!" मेरा जवाब सुनने से पहले ही वो आगे चले गए| खेर रात दस बजे ट्रैन मुंबई छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस पहुँची और मैं दोनों का सामान ले कर उतर गया| टैक्सी वाले से अँधेरी वेस्ट के लिए पूछा तो कोई भी जाने को तैयार नहीं था, मैंने ओला पर ढूंढा तो एक मिल गया पर अब स्टे की दिक्कत थी| टैक्सी वाले ने अपने जान-पहचान के 6-7  होटल दिखाए पर कहीं भी रूम खाली नहीं था और जहाँ था भी वो सिर्फ सिंगल रूम था| बड़ी मुश्किल से एक होटल मिला और मैडम वहाँ पूछताछ करने गईं और मैं बाहर ही रुक गया टैक्सी वाले के पास| मैडम ने अंदर से मुझे आवाज दी; "मानु जी आ जाइये|" मैंने शुक्र मनाया की कम से कम कमरा मिल गया वर्ण रात के 1 बजे कहाँ मारे-मारे फिरते| टैक्सी वाले को पैसे दे कर मैं उनके पास आया तो उन्होंने मुझे रजिस्टर में साइन करने को कहा| जब मैंने डिटेल पढ़ी तो मैं हैरान रह गया| मैडम ने Mr. Manu Maurya and Mrs. Anu Maurya लिखा था| अब ये देख कर मैंने मैडम की तरफ देखा तो वो बड़ी नार्मल लगीं मुझे! मैंने साइन तो कर दिया पर दिल अंदर से धक-धक करने लगा था| कमरे के अंदर पहुँचा तो लाइट्स मध्यम थीं, बिलकुल रोमांटिक वाली| मैंने तुरंत ही कमरे की ट्यूब लाइट जला दी और जब मैडम की तरफ देखा तो उनकी सांसें बहुत तेज थीं| वो सीधा बाथरूम में घुस गईं और आधे घंटे तक वहीँ रहीं| अब ज्यादा सोचने की जर्रूरत नहीं थी की वो वहाँ क्या कर रहीं हैं, मैंने इस मौके का फायदा उठाया और तुरंत अपने कपडे चेंज कर लिए| फिर मैं सोफे पर अपना बिस्तर लगाने लगा| जब मैडम बाहर आईं तो वो मुझसे नजरें चुरा रहीं थीं और मेरी तरफ पीठ किये हुए ही बोलीं; "आप यहाँ बेड पर सो जाओ वहाँ सोफे पर कैसे सोओगे?"

"It’s alright mam! I’ll manage.” मैंने भी उनकी तरफ देखे बिना ही कहा|

“um.. actually they had just one room and we’ve been searching for an hour… it was very late so… I…” मैडम को आगे बोलने में बहुत हिचकिचाहट हो रही थी|  
“I can understand mam!” इतना कह कर मैंने कमरे की लाइट बंद की और लेट गया| कुछ देर बाद मैडम उठीं और कपडे बदलने के लिए बाथरूम में घुस गईं, लाइट के स्विच की आवाज से मैं चौंक कर उठ गया और देखा तो मैडम अभी बाहर आईं थीं और वो सिल्क की शॉर्ट नाइटी  जो उनके जिस्म से इस कदर चिपकी हुई थी की क्या कहूँ? उनके कंधे नंगे थे और उन पर बस एक पतली सी स्ट्रिंग थी| डीप कट जिससे उनकी छातियों की घाटी साफ़ दिख रही होगी| अब चूँकि मैं दूर था तो वो घाटियाँ नहीं देख सकता था| अब ये सब देखते ही मेरे लंड में तनाव आने लगा था और मैं मुँह दूसरी तरफ कर के खुद पर काबू करने लगा| मैंने ऋतू के बारे में सोचना शुरू कर दिया| उसका मासूम चेहरा याद करने लगा, पर उसे याद करते ही मुझे कल शाम का वाक्य याद आ गया| अब तो लंड अकड़ के पूरा खड़ा हो गया और मैंने जान बुझ कर दूसरी तरफ करवट ली और मैं लंड की अकड़न छुपाने लगा| दस मिनट बाद मुझे कमरे में शराब की महक आने लगी और ये ऐसी महक थी जिसने मेरे दिमाग में कोहराम मचा दिया| मन बेचैन होने लगा और मैं उस खुशबु का पीछा करते हुए उठ बैठा और देखा मैडम बिस्तर पर बैठीं और उनके हाथ में एक पेग है! अब ये देखते ही मुझे डर लगने लगा की कहीं कुछ गलत न हो जाए| मैडम ने जब मुझे बैठे हुए देखा तो वहीँ से मुझसे पूछा; "आप पियोगे?" मैंने ना में सर  हिलाया पर कमरे में इतनी रौशनी नहीं थी की वो मेरी गर्दन हिलती हुई देख सकें| इसलिए उन्होंने दुबारा पूछा पर मेरे जवाब देने से पहले ही मेरे क़दमों में जैसे जान आ गई और वो अपने आप ही उनकी तरफ चल पड़े| पर दिमाग ने जैसे अंतर् आत्मा को झिंझोड़ा और अपना वादा याद दिलाया| मैंने “no thank you mam” कहा और बाथरूम में घुस गया, वाशबेसिन के सामने खड़े हो कर अपने आप को देखने लगा और अपने मन पर काबू करने लगा" बार-बात खुद को ऋतू को किया वादा याद दिलाने लगा, पर मन शर्म की खुशबु से बावरा हो गया था| मन कह रहा था की एक बार चीट करने में दिक्कत ही क्या है?! मैंने अपने मुँह पर पानी मारना शुरू कर दिया ताकि खुद को किसी तरह संभाल सकूँ| एक दृढ निश्चय कर मैं बाहर आया और वापस सोफे पर लेट गया और चादर ओढ़ ली पर मन साला काबू में नहीं आ रहा था| मैंने करवटें बदलनी शुरू कर दीं| मैडम ने इसका कुछ अलग ही मतलब निकाला, "Manu the couch’s not comfortable come and sleep on the other side, its not like I need the whole bed to myself! We are grownups and know our limits. No need to be afraid of me!”             


                                          “No mam, its okay… it’s a new place….umm….” मुझसे बोला नहीं जा रहा था| “Then come we’ll talk.” उन्होंने बात शुरू करने के लिए कहा|
अब मैं उठा और जा कर उनके सामने खड़ा हो गया तो उन्होंने अपने पास बैठने को कहा तो मैंने पास पड़ी कुर्सी उठा ली और उसे घुमा कर बैठ गया| 


अनु मैडम: आप बहुत फॉर्मेलिटी दिखाते हो?

मैं: umm… you’re my boss, I’m your employee. How can I sit or sleep next to you on a bed?

अनु मैडम: chivalry  ???

मैं: yes mam!

अनु मैडम: That’s the first time….. For me! (उन्होंने एक सिप लिया|)
मैं अब उनसे नजरें चुरा के इधर-उधर देख रहा था|
अनु मैडम: So do you have a girlfriend?


मैं: No

अनु मैडम: Wow! How come you’re single? You’re such a gentleman?
मैं: umm… I don’t get time!
अनु मैडम: I know… I know…. That asshole husband of mine is always yelling on you! I know….. bloody bastard! Ruining everyone’s life…. But I…(hic) … won’t let… (hic)


शराब अब मैडम पर अपने जादू दिखाने लगी थी और उन्होंने हिचकी लेना शुरू कर दिया था|

मैं:  ummm… mam… its getting late… we’ll talk tomorrow!

पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया और आखरी घूँट जैसे तैसे पिया और बाथरूम जाने को उठीं और लड़खड़ाने लगीं| मैंने कमरे की लाइट्स जला दी ताकि उन्हें ठीक से दिखाई दे और तब मैंने उन्हें ठीक से देखा और जो शराब का जादू मेरे मन पर हावी था वो खत्म हो गया और लंड अकड़ने लगा| मैडम अब बाथरूम में घुस गईं थीं, तो मैंने एक गहरी साँस ली और अपने जज्बातों पर काबू करने लगा और सोफे की तरफ घुमा और तभी मेरी नजर बोतल पर पड़ी| मैडम ने कम से कम तीन पेग मारे थे व्हिस्की के वो भी नीट! अब तो मुझे डर लगने लगा की आज रात जर्रूर कुछ होगा? ये सोचते हुए मैं एक कदम चला हूँगा की मुझे मैडम के बाथरूम से बाहर आने की आवाज आई और वो गिरने लगी| मैंने भाग कर उन्हें तुरंत थाम लिया पर अब तो गजब ही सीन था! मैंने मैडम को कमर से पकड़ रखा था और वो नीचे को झुकी हुई थीं| उनकी नाइटी बिलकुल उनके शरीर से चिपकी हुई थी, जिससे उनके सारे के सारे उभार दिखने लगे थे| उनके वो 38D के वक्ष! 30 इंची कमर मुझे उनकी तरफ खींचने लगी थी| लंड तो फूल चूका था और पूरी तैयारी में था की आज उसे कुछ नया मिलेगा चखने को मर मन मेरे काबू में था| मैंने उन्हें सहारा दे कर खड़ा किया, पर मैडम के मन में मेरे लिए कुछ गंदे विचार नहीं थे इसलिए उन्होंने किसी भी तरह की पहल नहीं की थी| मुझे लग रहा था की वो शायद इतने होश में तो हैं की सही और गलत पहचान सकें| खेर मैं उन्हें पलंग तक ले आया और उन्हें लिटा दिया और उनके ऊपर चादर डाल दी और वापस आ कर अपने पलंग पर लेट गया| मैं लेटे-लेटे सींचने लगा की ये आखिर हो क्या रहा था मेरे साथ? मेरे मन में उनके लिए कोई गंदे विचार नहीं हैं फिर भी किस्मत क्यों मेरे साथ ऐसा कर रही थी? ट्रैन में उनका मुझे पति बनाने का नाटक! मेरी गोद में सर रख लेट जाना वो भी बिना मुझसे पूछे? ठीक है की उन्हें उन लड़कों की गन्दी नजरों से बचना था पर एटलीस्ट मुझसे पूछा तो होता? फिर होटल के रजिस्टर में Mr. Manu Maurya nad Mrs. Anu Maurya लिखना? मुझे अपने साथ बिस्तर पर लेटने को कहना? फिर भले ही वो इसलिए कहा हो की मैं आराम से सो सकूँ! पर हूँ तो मैं पराया ही ना? ऑफिस में उन्होंने सिवाए काम के कभी मुझसे कोई बात नहीं की, प्लेटफार्म पर भी वो कुछ नहीं बोल रहीं थी, पर ट्रैन में बैठते ही वो इतना कैसे बदल गईं? हम दोनों में तो दोस्ती भी नहीं है की मैं इस साब को ये मान कर टाल दूँ की दोस्तों में ये सब चलता है| ये सोचते-सोचते मैं सो गया और सुबह 8 बजे उठा और देखा तो मैडम अब भी सो रही हैं| मैं नाहा-धो के तैयार हो गया| पर मैडम अब भी नहीं उठीं थी, मैंने एक ब्लैक कॉफ़ी आर्डर की और मैडम को उठाने के लिए उनके कन्धर पर दो उँगलियों से ना चाहते हुए छुआ| पर मैडम नहीं उठीं तो मजबूरन मुझे उन्हें थोड़ा हिलाना पड़ा और वो थोड़ा कुनमुनाने लगीं और अपनी आँखें खोलीं जो ठीक से खुल भी नहीं रही थीं; “ Good Morning Mam!” मेरा मुस्कुराता हुआ चेहरा देख कर उन्हें होश आया और उन्होंने साइड टेबल पर पड़ी अपनी घडी उठाई और टाइम देखा| मैं तुरंत घूम गया क्योंकि मुझे पता था उन्होंने बहुत तंग नाइटी पहनी है और उन्हें इस हालत में शर्म आना तय है| मेरे घूमते ही मैडम तुरंत बाथरूम में घुस गईं और मैं अपने बैग में लैपटॉप और कुछ फाइल रखने लगा| मेरी पीठ अब भी बाथरूम की तरफ थी, मैडम फटाफट बहार आईं और अपने कपडे ढूंढने लगीं| मैं बिना उनकी तरफ मुड़े ही दरवाजा खोल कर बाहर चला गया|


दस मिनट ही मैडम की ब्लैक कॉफ़ी आ गई जिसे मैंने चुप-चाप कमरे में रख दिया और बाहर लॉबी में बैग ले कर आगया| आधे घंटे बाद मैडम भी अपना बैग और लैपटॉप ले कर बाहर आ गईं और मुझसे नजरें चुराती हुई बाहर आ गईं और फ़ोन कर के राखी से पूछने लगीं की वो कहाँ है| मैडम ने इस समय बिज़नेस सूट पहन रखा था और वो बहुत सुन्दर लग रहीं थी, पर मुझे क्या? मेरे पास तो मेरा प्यार था; ऋतू! उसके आगे सब फीका था! मैंने ओला बुला ली थी और उसने हमें Palmer Infotech छोड़ा| वो एक बहुत बड़ी बिल्डिंग थी, जैसे की फिल्मों में दिखाया जाता है| दसवीं मंजिल पर पहुँचे तो वहां का नजारा बिलकुल कॉर्पोरेट वाला था| सभी लोग वहाँ बिज़नेस सूट पहने थे, एक मैं ही था जो वहाँ सिर्फ टाई पहने आया था| मुझे तो ऐसा लग रहा था जैसे की मैं वहाँ इंटरव्यू दे ने आया हूँ| मैं अभी उस कॉर्पोरेट कल्चर को महसूस करने में बिजी था की पीछे से राखी ने आ कर मेरी पीठ पर हाथ रखा और मैं एक दम से पलटा|

ये राखी वही लड़की थी जो पहले मेरे ऑफिस में काम करती थी और जिसे मैं ऋतू से प्यार होने से पहले पसंद करता था| "Hi Maanu! How’re you?”

“I’m fine, how you doing? How’s your new job?” मैंने पूछा|

“I already resigned, I’ll be joining sir again!” उसने कहा पर आगे कुछ बात होने से पहले ही मैडम आ गईं और वो अब भी मुझसे नजरें चुरा रही थीं| "मानु....अ...आप... यहीं वेट करो!" इतना कह कर मैडम और राखी दोनों अंदर चले गए| मैं सोचने लगा की ये सब हो क्या रहा है? मुझे अगर मीटिंग में शामिल ही नहीं करना था तो मुझे यहाँ लाये ही क्यों? पर फिर मुझे समझ आया की सबने बिज़नेस सूट पहना है और ऐसे में मैं ही सब से अलग दिख रहा था? मुझे ये सोच कर बड़ी निराशा हुई की मेरे पास कोई बिज़नेस सूट नहीं है| मैं वहीँ वेटिंग एरिया में चुप-चाप बैठ गया और ऋतू को फ़ोन किया पर उसने फ़ोन काट दिया! मुझे लगा की शायद क्लास में होगी, पर जब वो क्लास में होती तो कॉल काटते समय वो मैसेज कर देती थी| इसबार उसका कोई मैसेज नहीं आया था, मतलब साफ़ था की वो बहुत नाराज है| पर मैंने जब वहाँ लड़के-लड़कियों को आपस में खुल कर बातें करते देखा तो मैं सोचने लगा की जब वो जॉब करेगी तभी ये सब समझेगी| खेर मीटिंग 3 घंटे चली और मैं बुरी तरह बोर हो चूका था| जब मैडम और राखी बाहर आये तो वो काफी खुश दिखे पर मुझे मायूस देख राख ने पूछा; "क्या हुआ मानु?" मैडम फिर से नजरें चुरा कर दूसरी तरफ मुँह कर के जाने लगीं| "कुछ नहीं यार, आज पता चला की इंसान की जिंदगी में कपड़ों की क्या वैल्यू होती है!" ये मैडम ने सुन लिया पर वो कुछ नहीं बोलीं और रिसेप्शन की तरफ चली गईं| राखी मेरे पास आ कर बैठ गई और डिटेल पूछने लगी पर मैंने उसकी बात टाल दी| उसने बताय की प्रेजेंटेशन सक्सेसफुल रही और शायद कॉन्ट्रैक्ट हमें ही मिलेगा| तभी मैडम आ गईं और उन्होंने हमें कैफेट्रेरिअ चलने को कहा| वहाँ जा कर उन्होंने खाना आर्डर किया पर मेरा मन अब भी बुझा हुआ|


मैडम और राखी मीटिंग के बारे में बात कर रहे थे और मैं बस खिड़की से बाहर देख रहा था, वैसे भी मैं क्या इनपुट देता जब मुझे ये ही नहीं पता था की वहाँ हुआ क्या है? मैं अपनी कॉफ़ी ले कर चुप-चाप उठा और एक काँच की खिड़की के पास आ कर खड़ा हो गया| मेरा बयां हाथ मेरी पैंट की पॉकेट में था और मैं बस वो हरा-भरा नजारा देख रहा था| उम्मीद कर रहा था की शायद ऋतू कॉल कर दे, उसकी आवाज सुने हुए बहुत टाइम हो गया था| मैंने फ़ोन निकाला और दुबारा मिलाया पर एक घंटी बजते ही उसने फ़ोन काट दिया| आगे मैं कुछ सोचता उससे पहले ही राखी आ गई; "मानु! Come yaar! Let’s celebrate?” मैडम ने लंच आर्डर कर दिया था, मैं वापस आ कर बैठ गया और फिर राखी ने अपनी बातों से मेरा ध्यान लगाए रखा| मैं बस हाँ-ना में मुस्कुरा कर जवाब दे रहा था| लंच के बाद राखी की ट्रैन थी तो वो निकल गई, पर मेरी और मैडम की ट्रैन रात 11 बजे की थी जो हमें लखनऊ अगले दिन रात 3 बजे छोड़ती| राखी के जाने के बाद हम दोनों अकेले उसी टेबल पर बैठे थे, मैडम अब भी मुझसे नजरें चुरा रही थीं और मुझे रह-रह कर ऋतू की याद आ रही थी| अब वापस होटल भी नहीं जा सकते थे क्योंकि वहाँ एक कमरे में हम दोनों ही ऑक्वर्ड हो जाते| बात शुरू करते हुए मैंने मैडम से कहा; “congratulations mam … for the contract!” जवाब में उन्होंने बीएस मुस्कुरा दिया और "thank you" कहा| “so mam….should we just sit here…. Or go out?” मैडम ये सुन कर हैरानी से मेरी तरफ देखने लगीं| “Go out? Where?” उन्होंने पूछा| “ummm… how about beach?” मैंने थोड़ा उत्साह दिखते हुए कहा| तो उन्होंने वही प्यारी सी मुस्कान दी और वो उठ कड़ी हुईं| उनकी awkwardness अब खत्म हो गई थी| मैंने ओला बुक की और और उसने हमें जुहू बीच छोड़ा|                  
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update 18

वहाँ पहुँच कर मैं एक्सपेक्ट कर रहा था की बिलकुल खाली जगह होगी पर ये तो भीड़-भाड़ वाली जगह निकली| मैडम तो जा कर रेत में लगे पाँव बैठ गईं और मैं इधर-उधर टहलता रहा और फोटो क्लिक करता रहा, कुछ सेल्फी भी ली और सब फोटो ऋतू को भेज दी| उसने सब फोटो देख ली पर जवाब कुछ नहीं दिया| मैं वापस मैडम के पास आया तो वो ढलते हुए सूरज को देख रही थीं और मंद-मंद मुस्कुरा रही थी| मैंने दो नारियल लिए और मैडम की तरफ बढ़ाया, मैडम एक डीएम से चौंक गईं पर बोली कुछ नहीं| एक सिप नारियल पानी पीने के बाद मुझे इशारे से वहीँ रेट में बैठने को कहा| मैं भी उन्हीं के साथ बैठ गया पर थोड़ी दूर और ढलते हुए सूरज को देखने लगा| फिर बैठे-बैठे कुछ फोटो खींची और उन्हें एडिट करने लगा| मैडम ने ये देख लिया पर कुछ बोली नहीं, फिर वो कुछ सोचने लगी और अपना मुँह झुका लिया| “Manu… I….I’m sorry for whatever happened last night? I misbehaved…” उन्होंने सर झुकाये हुए कहा, पर इससे पहले वो कुछ आगे कहती मैंने उनकी बात काट दी| "But nothing happened mam! I mean we had a lil chat and then you were kindaa drunked and said a lot of things about sir and then I said good night. That’s it…. Well you did almost fell down.” ये सुन कर मैडम के मन से गिलटी वाली फीलिंग खत्म हुई और वो गिरने वाली बात से तो वो थोड़ा हँस भी दी| 

“Thank God! I’ve been living in guilt since morning. I thought I may have done something which was…..” वो आगे कहते-कहते रुक गईं| उन्हें डर था की नशे की हालत में शायद हम दोनों ने सेक्स किया होगा|

“I’ve another confession to make, I kindaa took advantage of your chivalry in the past 48 hours! I mean that train incident, writing our names as Mr. and Mrs. Maurya… I’m really sorry! I was so scared in train… I’ve never travelled alone in my entire life and ….” उन्होंने सर झुकाये हुए कहा|

“Its okay mam… I can understand… I know it wasn’t intentional or anything.”

“मेरा इरादा तुम्हें छूने का कतई नहीं था, उस समय तुम मेरे लिए सहारा थे और मुझे तुम पर भरोसा था की तुम मेरा कोई गलत फायदा नहीं उठाओगे| वैसे ही भरोसा जो एक दोस्त को दूसरे दोस्त पर होता है|" ये सुनने के बाद मुझे मेरे रात वाले सवालों का जवाब मिल गया था| मैडम मुझे अपना दोस्त समझती थीं पर ये सब शुरू कैसे हुआ ये जानने को मन बेचैन था| “umm… mam if you don’t mind me asking, in office we barely spoke! I mean we only had conversation regarding work. So h..h.. how did we become friends?”   मैंने थोड़ा झिझकते हुए पूछा| 
“Well I don’t think a conversation is required to start a friendship.” मैडम का ये जवाब मुझे बहुत ही अटपटा लगा क्योंकि बिना बात किये कोई दोस्त कैसे बन सकता है? पर मैंने आगे उनसे इस बारे में कोई बात नहीं की और चुप-चाप सूरज को ढलते हुए देखने लगा| अचानक ही मैडम कड़ी हुईं और मुझे अभी अपने साथ चलने को कहा| मुझे लगा की उनका मन भर गया होगा इसलिए वो अब जाना चाहती हैं पर फिर मेरी नजर उनके पैरों पर पड़ी| मैडम अब भी नंगे पाँव थीं मतलब वो चाहती थी की मैं उनके साथ वॉक करूँ| मैंने भी अपने जूते उतारे और नंगे पाँव हम दोनों रेत पर चलने लगे| “The general traits of a friendship include similar interests, mutual respect and an attachment to each other….” ये कहते हुए मैडम एकदम से रुक गईं, ऐसा लगा जैसे वो कुछ ऐसा बोल गईं जो उन्हें नहीं बोलना चाहिए था| मैं अब कुछ-कुछ समझने लगा था की आखिर मैडम के मन में क्या चल रहा है पर कुछ भी कहने से डर रहा था| डर इसलिए रहा था की कहीं मैं गलत निकला तो मैडम के नजर में जो मेरी इज्जत है वो चली जाएगी और एक डर ये भी था की कहीं मेरे कुछ कहने से उनका दिल न टूट जाए| मैंने सोचा की मैं अपनी बात कुछ इस तरह से रखूँगा की उन्हें ये समझ आ जाये की मैं प्यार क्यों नहीं कर सकता|



“You’re even giving me company in walking!” इतना कह कर वो हँसने लगीं| “So now we’re friends right?” अब मैं इसका जवाब ना तो नहीं दे सकता था, इसलिए मैंने हाँ में सर हिलाया और मैडम ने हाथ मिलाने के लिए अपना दायाँ हाथ आगे बढ़ाया| मैंने अभी उनसे हाथ मिलाया और मुस्कुरा दिया, हम वॉक करते-करते करीबन एक किलोमीटर दूर आ गए तो मैडम ने चाय पीने के लिए कहा| टापरी वाली मस्त चाय पी कर मैडम में शॉपिंग के लिए बोला और हम जुहू मार्किट आ गए वहाँ मैडम ने कुछ बालियाँ खरीदी और खरीदते वक़्त वो बार-बार मुझसे पूछती की ये कैसी है| मैंने भी पूरा इंटरेस्ट लेते हुए उन्हें एक बालियाँ उठा के दीं जो उन पर बहुत जच रही थी| उन्हें पहन के तो मैडम खुश हो गईं और मेरी पसंद की तारीफ करने लगीं| मेरा मन किया की मैं ऋतू के लिए भी एक बाली खरीदूं पर मैडम से क्या कहूँगा ये सोच कर रह गया| कुछ दूर आ कर मैडम ने मॉल जाने के लिए कहा और हम एक मॉल में घुसे| वहाँ एक शोरूम में मैडम ने मुझे एक बिज़नेस सूट दिया और try करने को कहा| अब ये देख कर तो मेरी आँख फटी की फटी रह गई| "I’m sorry mam! I can’t take this.” 


"क्यों?" मैडम ने सवाल पूछा| “Mam its way too costly! I …I can’t afford it!” मैंने दबी हुई आवाज में कहा| “Oh come on! It’s a gift… from a friend to another.” 
“No…No…No… Mam… I can’t… please” मैंने उन्हें मना करते हुए कह| पर उन्होंने कबरदस्ती करते हुए कहा; "इसका मतलब की हम दोस्त नहीं हैं?" "जी मैंने ऐसा तो कुछ नहीं कहा| दोस्ती में जर्रूरी तो नहीं की इतना महँगा गिफ्ट दिया जाए?" मैंने उन्हीं की बात उन पर डालते हुए कहा| "पर मैं अपनी ख़ुशी से दे रही हूँ!"


"जानता हूँ mam पर मैं इतना महँगा गिफ्ट अभी deserve नहीं करता!" मैंने बात खत्म करना चाहा पर मैडम तो जैसे अड़ ही चुकी थी की वो मुझे गिफ्ट दे कर रहेंगी| "क्या deserve नहीं करता?" उन्होंने गुस्से में मेरा हाथ पकड़ के मुझे एक तरफ खड़ा किया और गुस्से में बोली; "एक लड़का जो पिछले दो दिन से मेरा इतना ख्याल रख रहा है, ट्रैन में मुझे उन लफंगों की गन्दी नजरों से बचाता है! होटल के एक कमरे में मैं नशे में थी फिर भी जिसने मेरा कोई गलत फायदा नहीं उठाया वो ये सूट deserve नहीं करता तो फिर इस दुनिया में chivalry की कोई कीमत ही नहीं है|"

"Mam तो आप मुझे ये सब करने की कीमत दे रहे हो? अभी तो आप ने कहा की हम दोस्त हैं और अभी आप कीमत की बात कर रहे हैं?"

"मेरा वो मतलब नहीं था..... उस टाइम आपने राखी से कहा था ना की आज पता चला की इंसान की जिंदगी में कपड़ों की क्या वैल्यू होती है, मुझे बहुत बुरा लगा|"

"Mam वो...." आगे बोलने के लिए मेरे पास शब्द नहीं थे| मैं बहुत ही गैरतमंद इंसान हूँ और उनसे ऐसा कोई भी तोहफा नहीं लेना चाहता था| शायद वो ये समझ गईं थीं इसलिए वो बोलीं; "अच्छा एक शर्ट तो ले लो?" अब मुझे बुरा लग रहा था की मैं भला कब तक उन्हें ऐसे मना करूँ| "ठीक है पर पैसे मैं दूँगा|"

"अरे ये क्या बात हुई? ठीक है! पसंद मैं करुँगी|" उन्होंने हँसते हुए कहा और मैंने भी और मना नहीं किया| फिर मैडम ने एक नेवी ब्लू कलर की एक शर्ट पसंद की जिसे मैंने उन्हें try करके दिखाया और पैसे मैंने दिए|


शाम के 6 बजने लगे थे तो मैडम ने पावभाजी खाने के लिए कहा| मैं इधर सोच रहा था की ऋतू के लिए क्या खरीदूँ, आखिर मुझे याद आया की उसने एक बार मुझसे डायरी माँगी थी| तो पावभाजी खाने के बाद मैंने एक डायरी ली और मैडम ने मुझे वो डायरी लेते देखा तो खुद को पूछने से खुद को रोक पाईं; "आप शायरी करते हो क्या?" अब मुझे कुछ तो जवाब देना ही था सो मैंने हाँ में सर हिला दिया और ये सुन करते वो मुझसे और भी ज्यादा इम्प्रेस हो गईं| तो एक शेर हमें भी सुनाइए! मैडम की फरमाइश पर मुझे ऋतू की याद आ गई और फिर मुझे घुलम अली जी का एक शेर याद आ गया;

"फासले ऐसे भी होंगे,

ये कभी सोचा ना था.

सामने बैठा था मेरे,

और वो मेरा ना था|"

ये सुनते ही मैडम एक दम से चुप हो गईं और एक पल के लिए मेरे सामने ऋतू का चेहरा आ कर ठहर गया| "आप शायरी इस डायरी में जर्रूर लिखना|" इतना कह कर मैडम ने अपनी चुप्पी तोड़ दी और मैंने भी सोचा की इसे पढ़ कर ऋतू भी खुश हो जाएगी| शायद उसे उसकी बेरुखी भी याद आ जाये! खेर हम थोड़े दूर वहीँ घूमें, मैंने मैडम की कुछ तसवीरें लीं उन्हींके फ़ोन से और फिर खाना खा कर होटल 8 बजे पहुँचे| वहाँ से चेक-आउट किया और स्टेशन पहुँच गए और वहाँ एक बेंच पर बैठ गए| ट्रैन आई और हम अपनी-अपनी बर्थ पर लेट गए| इस बार हमारी टिकट्स कन्फर्म हो गई थीं, नाम वाली दिक्कत अब भी हुई तो फिर मैंने कैसे ना कैसे कर के बात संभाल ली| 

आज रात मैं चैन से सोया इस ख़ुशी में की सैटरडे मुझे देख कर ऋतू खुश हो जाएगी| हालाँकि मैडम ने दो बार मुझे उठाया था क्योंकि उन्हें वाशरूम जाना था और मैंने इसका कोई माइंड नहीं किया| अगले दिन आठ बजे मैडम ने मुझे उठाया, फ्रेश हो कर हम ने चाय-नाश्ता किया| सर का फ़ोन आया और मुझे नहीं पता की उनकी क्या बात हुई क्योंकि मैं डायरी में वही शेर लिख रहा था| सर से बात कर के मैडम ने बात शुरू की; "Isn’t it strange, a handsome guy filled with so much of chivalry is single?” उन्होंने chivalry शब्द पर बहुत जोर दे कर कहा| ये सुन कर मेरे मन में जो पहले विचार आया था की शायद मैडम मुझसे प्यार करती हैं, क्यों ना उस विचार का गाला घोट दूँ| मैंने बहुत गंभीर होते हुए कहा; "Mam my village is famous for honor killing! My cousin’s wife was burned alive because of this!” ये सुनते ही मैडम के हालत देखने लायक थी, उनका मुँह खुला का खुला रह गया| उनका हँसता-खेलता हुआ चेहरा मायूस हो गया और तभी उनको याद आय की वो ट्रैन वाला हादसा और जो होटल में हुआ वो; "I….I’m really sorry! That TTE saw us…and…h…how….what are you going to tell them?” उनकी घबराहट उनके चेहरे से झलक रही थी और मैं भी अंदर ही अंदर जानता था की जब ये बात सामने आएगी तो काण्ड होना तय है| क्योंकि कोई भी मेरी बात पर ऐतबार नहीं करता की जो कुछ हुआ उसमें मेरी कोई गलती नहीं थी| मैंने नकली मुस्कराहट अपने चेहरे पर लाते हुए कहा; “Haven’t thought about it! But don’t worry I won’t drag you in that mess!” मैंने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा पर बिलकुल मायूस हो गईं और फिर से गिलटी महसूस करने लगी| अब उस समय मैं अगर ज्यादा कुछ बोलता तो शायद उसका कुछ गलत मतलब निकलता, उन्हें कहीं ये ना लगे की मेरे मन में भी उनके लिए कोई प्यार-व्यार है इसलिए मैं चुप-चाप फिर से लेट गया| पर मैडम बहुत उदास थीं!

अब एक हँसता-खेलता इंसान मेरे कारन गुम-शूम हो गया था और रह-रह कर मैं गिलटी महसूस करने लगा था| "Mam you don’t have to worry, the least punishment I’ll get is either marriage or kicked from home. And trust me I’m really happy for the later punishment!” मैंने थोड़ा हँसते हुए कहा ताकि उनका कुछ मन हल्का हो पर वो अब भी गुम-सुम थीं| "Mam आपके इस तरह गुम-सुम होने से इसका कोई हल तो निकलेगा नहीं| जब ये बात सामने आएगी तब मैं इसका कोई ना कोई हल निकाल लूँगा|" पर मैडम अब भी चुपचाप थीं, इससे ज्यादा मैं उन्हें कुछ कह नहीं सकता था| पूरा सफर वो इसी तरह गुम-सुम रहीं और मुझसे कोई भी बात नहीं की| रात दो बजे हम स्टेशन पहुँचे और अब वहाँ से घर जाना था| सर कार ले कर हम दोनों को लेने आये और मुझे घर छोड़ा| जब मैं जाने लगा तो मैडम ने मुस्कुराते हुए कहा; "कल की छुट्टी ले लेना, See you on Monday!" ये सुन कर मेरी लाटरी निकल गई और मैंने उन्हें 'Thank you mam' कहा और ऊपर चला गया| सर की उस टाइम जली जर्रूर होगी पर वो कुछ बोले नहीं| बिस्तर पर ऐसे ही पड़ गया और सो गया, अगली सुबह 7 बजे उठ कर तैयार हुआ और ऋतू के कॉलेज के लिए निकल गया| उसके कॉलेज के गेट पर बाइक रोक कर उसका इंतजार करने लगा, जैसे ही उस की नजर मुझ पर पड़ी वो भाग कर आई और मेरे गले लग गई और उसकी आँखों से गंगा-जमुना बहने लगी| "ये तीन मैंने कैसे काटे मैं ही जानती हूँ!" उसने रोते-रोते कहा|

"तीन दिन से मेरे कॉल 'काट' ही तो रही थी|" मैंने उसे छेड़ते हुए कहा| ये सुन कर ऋतू फिर से गुस्सा हो गई पर उसे मानाने के लिए मैंने उसे उसका तौहफा दिया| डायरी देख कर तो वो खुश हो गई और उस पर छापे गेटवे ऑफ़ इंडिया की तस्वीर देख कर वो और भी खुश हो गई| अंदर खोल कर देखा तो दूसरे पैन पर मैंने वही शेर लिखा था जिसे पढ़ कर उसे मेरे दिल के दर्द के बारे में एहसास हुआ पर वो कान पकड़ के माफ़ी माँगने लगी| इतने में उसकी एक सहेली भी आ गई और मुझे देखते ही वो समझ गई की मैं उसका बॉयफ्रेंड हूँ| हालाँकि मैं ये नहीं चाहता था और उम्मीद कर रहा था की ऋतू बोलेगी की मैं उसका चाचा हूँ| पर ऋतू के कुछ कहने से पहले ही वो बोल पड़ी; "ओह! तो ये ही हैं वो जिनकी वजह से तू इतने दिन गुम-सुम थी?" ये सुन कर वो शर्मा गई और मेरी बाजू पर अपना सर रख दिया| "Hi" मैंने इतना कहा और उसने होना हाथ आगे करते हुए कहा; "Myself काम्य|| मैंने उसका हाथ मिलाया और "मानु" कहा| काम्य ने मेरा हाथ बहुत जोर से दबा रखा था और वो हाथ छोड़ ही नहीं रही थी इसे देख ऋतू जल गई और उसने दोनों का हाथ छुड़वा दिया| "हेल्लो मैडम आप जा कर अपने वाले से हाथ मिलाओ|" ये सुन कर हम दोनों हँस पड़े|                      

   "तो चलें?" मैंने ऋतू से कहा तो हैरानी से मेरी तरफ देखने लगी| "क्या कोई जर्रूरी लेक्चर है?" वो खुश हो गई और ना में सर हिलाया और फ़ौरन बाइक पर पीछे बैठ गई| काम्य और जोर से हँसने लगी और फिर बाय बोल कर चली गई| ऋतू हमेशा की तरह मेरी पीठ से चिपक कर बैठ गई, जैसे की तीन दिन से उसका जिस्म बर्फ बन गया था और मेरे बदन की तपिश से वो सारी बर्फ पिघलना चाहती थी| "तो जान! बताओ की जाना कहाँ है?" मैंने उससे पूछा|

"घर और कहाँ?" ऋतू तपाक से बोली| मैं समझ गया था की उसे घर क्यों जाना था तो मैंने रास्ते से खाने के लिए कुछ पैक करवाया और फिर हम दोनों घर आ गए|
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     ऊपर आ कर जैसे ही मैंने दरवाजा बंद किया की ऋतू ने मुझे पीछे से कस कर अपनी बाहों में भर लिया| "हम्म्म्म....आप के बिना इतना दिन मैं अधूरी हो गई थी|" ऋतू ने मेरी पीठ पर कमीज के ऊपर से kiss करते हुए कहा| मैं उसकी तरफ घुमा और उसे गोद में उठा कर पलंग पर लिटाया और जूते उतार के मैं भी उसकी बगल में पाँव ऊपर कर के लेट गया| उसने मेरे बाएं हाथ को अपना तकिया बनाया और मुझसे मुंबई के बारे में सब पूछने लगी| मैंने पहले तो उसे मेरे कॉर्पोरेट वर्ल्ड का एक्सपीरियंस बताया जिसे सुन कर वो दंग रह गई| मेरे बिज़नेस सूट वाली बात पर वो भी मायूस हुई और कहने लगी की जब उसे पहली सैलरी मिलेगी तो वो मुझे ये सूट दिलाएगी| ये सुन कर मुझे उस पर बहुत प्यार आने लगा| वहाँ खींची तसवीरें देख ऋतू का मन वहाँ जाने का कर रहा था और वो कहने लगी की शादी के बाद जब हमारी लाइफ सेटल हो जाएगी तो वो मुंबई मेरे साथ जर्रूर जाएगी| इसी तरह से हम दोनों बातें करते रहे और फिर मैंने सोचा की उसे सच-सच बता दूँ जो भी कुछ हुआ, क्योंकि मैं उससे कुछ भी नहीं छुपाना चाहता था| तो मैंने उसे शुरू से लेकर आखिर तक सारी बात बता दी और ये सब सुनते ही वो छिटक कर मुझसे दूर कड़ी हो गई|

ऋतू: तो इसलिए गए थे ना आप उस मैडम के साथ? (उसने गुस्से में कहा)

मैं: यार मैंने क्या किया? बॉस ने लास्ट मोमेंट पर बोला की उनकी जगह Mam जाएँगी तो मैं क्या करता?

ऋतू: उसकी हिम्मत कैसे हुई आपको छूने की?

मैं: यार कुछ गलत इंटेंशन नहीं था उनका| वो बस....

ऋतू: (मेरी बात काटते हुए) आपको कैसे पता की इंटेंशन सही थी या गलत? और आपक ने उसे खुद को छूने कैसे दिया? (ऋतू ने चीखते हुए कहा|)

मैं: ऋतू बात को समझने की कोशिश कर! वो दोनों लड़के उन्हें घूर-घूर के देख रहे थे! She was scared! वो मुझे trust करती थीं इसलिए उन्होंने सिर्फ मेरी गोद में सर रखा| मैंने उन्हें जरा भी नहीं छुआ?

ऋतू: ये देखने के लिए मैं तो नहीं थी ना? एक होटल में दोनों पति-पत्नी के नाम से रहे रहे थे! आपने उसे जरा भी नहीं कहा की mam आप ये गलत कर रहे हो?

मैं: रात के तीन बज रहे थे, कहीं भी कमरा नहीं मिल रहा था! हर कोई गलत ही सोच रहा था तो ऐसे में उन्हें मजबूरन झूठ लिखना पड़ा| मेरा विश्वास कर उस रात मैं सोफे पर सोया था और वो पलंग पर! हमारे बीच कुछ भी नहीं हुआ था| एक पल भी मेरे मन में कोई गलत विचार नहीं आया! उन्होंने तो मुझे दारु भी ऑफर की पर मैंने सिर्फ इसलिए मना कर दिया क्योंकि मैंने तुमसे वादा किया था|, इतना प्यार करता हूँ तुम से!   

ऋतू: मैं कैसे मान लूँ? एक कमरे में एक आदमी और एक औरत हैं और फिर भी उन दोनों के बीच कुछ नहीं हुआ! ये सतयुग है क्या?

मैं: .....

ऋतू: (मेरे कुछ कहने से पहले ही ऋतू बोल पड़ी|) आपको कैसा लगता अगर ये सब मेरे साथ हुआ होता? क्या आप मेरी बात पर भरोसा करते?

मैं: (उसकी आँखों में देखते हुए) हाँ ... मैं तुम्हारी बात का विश्वास करता क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ, तुम पर आँख मूँद कर विश्वास करता हूँ|

ऋतू: Well मैं आप पर विश्वास नहीं कर सकती! उस जैसी बाला की खूबसूरत औरत के साथ आप रहे और फिर भी उसे छुआ तक नहीं|


ये सुन कर मेरा दिल बहुत दुख की वो मुझ पर जरा भी भरोसा नहीं करती| पर मैंने जैसे-तैसे खुद को संभाला|

 

ऋतू: जब मैंने उसे वीडियो कॉल पर देखा था तभी से मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था! मुझे पता था वो आपको मुझसे छीन लेगी| (ये बोलते हुए रोने लगी| मैंने उसके आँसूँ पोछने चाहे तो उसने मेरा हाथ झिटिक दिया|)

मैं: जान मेरी बात को समझो! प्लीज ... प्लीज मेरा विश्वास करो! (मैंने उसके आगे हाथ जोड़े पर उसका उसक पर कोई असर नहीं पड़ा|)

ऋतू: आप एक बात का जवाब दो, जब आपके बॉस ने कहा की मेरी जगह आप मेरी बीवी के साथ चले जाओ तो आप मना नहीं कर सकते थे?

मैं: यार वो बॉस है मेरा, उसका कहा मानने के पैसे मिलते हैं मुझे|

ऋतू: कल को वो कहेगा की उसकी बीवी के साथ सो जाओ तो आप सो जाओगे?

ये सुन कर मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने ऋतू पर हाथ छोड़ दिया|

मैं: बस! अब बहुत हो गया, इतनी देर से मैं मिन्नतें कर रहा हूँ और तुम्हें उस पर विश्वास ही नहीं हो रहा है| मैं चूतिया था जो मैंने तुम्हें सब कुछ बता दिया, ये विश्वास कर के की तुम्हें सच पता होना चाहिए| पर नहीं तुम्हें तो बेकार का बखेड़ा खड़ा करना है?                        

ऋतू रोने लगी और रोते हुए बोली; "आपके मन में उस के लिए प्यार है, उसकी इज्जत प्यारी है आपको? मेरी कोई वैल्यू नहीं?" इतना कह कर वो रोती हुई चली गई, मैं भी उसके पीछे-पीछे भागा और उसे आवाज दे कर रोकना चाहा पर वो नहीं रुकी और ऑटो कर के चली गई| मुझे उसकी चिंता हुई तो मैंने जल्दी से ऑटो का नंबर नोट किया और घर वापस आ गया| मैं जमीन पर बैठा सोचता रहा की अभी जो कुछ हुआ उसमें मेरी गलती थी क्या? ऋतू को सच बताना गलती थी? या उस दिन मौके का फायदा नहीं उठाना गलती थी? या फिर मैंने ऋतू पर हाथ उठाया, वो गलत था? पर मैंने हाथ इसलिए उठाया क्योंकि अनु मैडम के चरित्र पर ऊँगली उठा रही थी! दिमाग में जैसे उधेड़-बुन शुरू हो गई थी, दिमाग कहता था की तुझे ऋतू को बताने की जर्रूरत नहीं थी| पर दिल कह रहा था की तूने इसलिए बताया क्योंकि आगे चल कर हमारे रिश्ते में कोई गाँठ ना पड़ जाए| ये ऋतू का बचपना है, कुछ देर में शांत हो जायेगा| पर ऐसा कुछ नहीं हुआ, मैं उसे कॉल करता रहा पर उसने फ़ोन बंद कर दिया|  मैंने उसके कॉलेज के चक्कर लगाना शुरू कर दिया पर अब उसने मुझे वहाँ भी इग्नोर करना शुरू कर दिया| एक दिन मैं उसके हॉस्टल भी गया उससे मिलने पर वहाँ भी उसने मुझसे कोई बात नहीं की, बस हाँ-ना में जवाब देती रही| अब चूँकि वहाँ आंटी जी थीं तो मैं ज्यादा कुछ कह भी नहीं पाया| वो भी उठ कर चली गई ये बहाना कर के उसे असाइनमेंट पूरा करना है| पूरे दो हफ्ते तक ऋतू इसी तरह करती रही, फोन बंद रखती और मैं यहाँ उसे रोज फ़ोन करता इस आस में की शायद अब वो फ़ोन उठा ले! इधर ऑफिस में मैडम अब मुझसे हँसते हुए बात करने लगी थीं, पर सिर्फ तब जब सर नहीं होते थे| मैं उनके सामने बीएस उसी तरह जवाब देता जैसे पहले देता था उससे ज्यादा मैंने कुछ रियेक्ट नहीं किया| जब की मेरे मन का दुःख सिर्फ मैं ही जानता था|    


एक दिन मैं ऑफिस मीटिंग में था की तभी कुछ हुआ| ऋतू मेरे ऑफिस आई और उसने जानबूझ कर अनु मैडम से बात शुरू की;

ऋतू: हेल्लो mam!

अनु मैडम: Hi ... सॉरी मैंने आपको पहचाना नहीं!

ऋतू: Actually mam मुझे ये डायरी ट्रैन में मिली| किसी Mr. Manu की डायरी है| इसमें यहाँ का एड्रेस लिखा था तो मैं एड्रेस ढूंढते हुए यहाँ आ गई| (ये एड्रेस उसने खुद ही लिखा था|)


अनु मैडम: ओह! हाँ... ये तो मानु की ही डायरी है| Thank you so much!
ऋतू: Is he your husband?


अनु मैडम: Oh no no no… he works here, he’s in a meeting right now. 
ऋतू: I’m really sorry… I didn’t mean to….. sorry!
अनु मैडम: Its okay! 
तभी सर ने मैडम को बात करते हुए देख लिए और अंदर बुलाया; "That’s my husband! I…I’m sorry I’ve to go. Why don’t you wait here and we can have a cup of coffee.” 
“Oh no..no.. mam I’ve to leave… I’ve to rush back to my hostel.” 
“Then please gimme your number, I’ll call you and then we can have a a cup of coffee, my treat!!” और ऋतू ने उन्हें अपना नंबर दिया और मैडम ने उन्हें अपना फ़ोन नंबर दिया| इधर सर हमें नए AS (Accounting Standard) पर ज्ञान दे (चोद) रहे थे| मैडम अंदर आईं और उन्होंने मेरी तरफ डायरी बढ़ा दी| ये वही डायरी थी जो मैंने ऋतू को दी थी! उसे देखते ही मेरे चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी और मैं बाहर जाने को बेचैन हो गया| "Excuse me sir" इतना कह कर मैं बाहर भागा पर वहाँ कोई भी नहीं था| मैं सोचने लगा की अभी हुआ क्या? ये डायरी मैडम तक कैसे पहुँची? अभी मैं ये सोच ही रहा था की मैडम ने पीछे से मेरे कंधे पर हाथ रखा और मेरी उधेड़-बुन समझते हुए उन्होंने मुझे सारी बात बताई|


मैडम की बात सुन कर मुझे बहुत गुस्सा आया की ऋतू यहाँ तक आई सिर्फ डायरी वापस करने! अपना गुस्सा मैं काम पर उतारने लगा और देर रात तक ऑफिस में बैठा रहा| कई बार फ़ोन मिलाया पर ऋतू का फ़ोन बंद ही था| तब मुझे लगा की ऋतू ने मेरा नम्बर ब्लॉक तो नहीं कर दिया, इसलिए मैंने ऑफिस के लैंडलाइन से फ़ोन किया तो इस बार घंटी गई| 5-7 घंटी के बाद उसने फ़ोन उठा लिया; "तो मेरा नंबर ब्लॉक कर रखा था ना?" ये सुन कर वो कुछ नहीं बोली| फिर मन नहीं किया की आगे उसे कुछ कहूं, इसलिए मैंने फ़ोन रख दिया और अपना बैग उठा के चल दिया| घर आया और बिना कुछ खाय-पीये ही सो गया|       
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update 20

उस रात मुझे बुखार चढ़ गया पर फिर भी सुबह मैं नाहा-धो के ऑफिस निकल गया| पर दोपहर होने तक हालत बहुत ज्यादा ख़राब हो गई, कमजोरी ने हालत बुरी कर दी| मैंने एक चाय पि पर तब भी कोई आराम नहीं मिला, नजाने कैसे पर मैडम को मेरी ख़राब तबियत दिख गई और वो मेरे पास आईं, मेरे माथे पर हाथ रख उन्हें मेरे जलते हुए शरीर का एहसास हुआ और उन्होंने मुझे डॉक्टर के जाने को बोला| मैं ऑफिस से निकला और बड़ी मुश्किल से घर बाइक चला कर पहुँचा| घर आते ही मैं बिस्तर पर पड़ा और सो गया, रात 8 बजे आँख खुली पर मेरे अंदर की ताक़त खत्म हो चुकी थी| मैंने खाना आर्डर किया ये सोच कर की कुछ खाऊँगा तो ताक़त आएगी पर खाना आने तक मैं फिर सो गया|  जब से मैं शहर आ कर पढ़ने लगा था तब से मैं अपना बहुत ध्यान रखता था| जरा सा खाँसी-जुखाम हुआ नहीं की मैं दवाई ले लिया करता था| मैं जानता था की अगर मैं बीमार पड़ गया तो कोई मेरी देखभाल करने वाला नहीं है, पर बीते कुछ दिनों से मैं बहुत मटूस था| ऐसा लगता था जैसे मैं चाहता ही नहीं की मैं ठीक हो जाऊँ| खाना आने के बाद उसे देख कर मन नहीं किया की खाऊँ, दो चम्मच दाल-चावल खाये और फिर बाकी छोड़ दिया और बिस्तर पर पड़ गया| रात दस बजे मैडम का फ़ोन आया और उन्होंने मेरा हाल-चाल पूछा तो मैंने झूठ बोल दिया; "Mam मुझे कुछ दिन की छुट्टी चाहिए ताकि मैं घर चला जाऊँ, यहाँ कोई है नहीं जो मेरी देखभाल करे|" मैडम ने मुझे छुट्टी दे दी और मैं फ़ोन बंद कर के सो गया| वो रात मुझ पर बहुत भारी पड़ी, रात 2 बजे मेरा बुखार 103 पहुँच गया और शरीर जलने लगा| प्यास से गाला सूख रहा था और वहाँ कोई पानी देने वाल भी नहीं था| ऋतू को याद कर के मैं रोने लगा और फिर होश नहीं रहा की मैं कब बेहोश हो गया|


जब चेहरे पर पानी की ठंडी बूंदों का एहसास हुआ तो धीरे-धीरे आँखें खोलीं, इतना आसान काम भी मुझसे नहीं हो रहा था| पलकें अचानक ही बहुत भारी लगने लगी थीं, खिड़की से आ रही रौशनी के कारन मैं ठीक से देख भी नहीं पा रहा था| कुछ लोगों की आवाजें कान में सुनाई दे रही थी जो मेरे आँख खोलने पर खेर मना रहे थे| "उठो ना?" ऋतू ने मुझे हिलाते हुए कहा और तभी उसकी आँख से आँसू का एक कतरा गिरा जो सीधा मेरे हाथ पर पड़ा| अपने प्यार को मैं कैसे रोता हुआ देख सकता था, मैंने उठने की जी तोड़ कोशिश की और बाकी का सहारा ऋतू ने दिया और मुझे दिवार से पीठ लगा कर बिठा दिया| अब जा के मेरी आँखों की रौशनी ठीक हो पाई और मुझे अपने कमरे में 3-4 लोग नजर आये| मेरे मकान मालिक अंकल, उनका लड़का और उनकी बहु और बगल वाले पांडेय जी| मेरे मुँह से बोल नहीं फुट रहे थे क्योंकि गला पूरी तरह से सूख चूका था| ऋतू ने मुझे पीने के लिए पानी दिया और जब गला तर हुआ तो थोड़े शब्द बाहर फूटे; "आप सब यहाँ?"

सुभाष जी (मकान मालिक) बोले; "अरे बेटा तेरी तबियत इतनी ख़राब थी तो तूने हमें बताया क्यों नहीं? ये लड़की भागी-भागी आई और इसने बताया की तू दरवाजा नहीं खोल रहा, पता है हम कितना डर गए थे की कहीं तुझे कुछ हो तो नहीं गया?" अब मुझे सारी बात समझ आ गई, पर हैरानी की बात ये थी की ऋतू यहाँ आई क्यों? पर ऋतू को रोते हुए देख उसपर जो कल तक गुस्सा आ रहा था वो अब भड़कने लगा था| "चलिए डॉक्टर के|" ऋतू ने सुबकते हुए कहा| मैंने ना में सर हिलाया; "इतनी कोई घबराने की बात नहीं है, दवाई खाऊँगा तो ठीक हो जाऊँगा|" "आपका पूरा बदन बुखार से जल रहा है और आप इसे हलके में ले रहे हैं?" ऋतू ने अपने आँसूँ पोछते हुए कहा| पर मैं अपनी जिद्द पर अड़ा रहा और डॉक्टर के नहीं गया| मैं जानता था की मुझे इस तरह देख कर ऋतू को बहुत दर्द हो रहा था और यही सही तरीका था उसे सबक सिखाने का! मुझ पर भरोसा नहीं करने की कुछ तो सजा मिलनी थी उसे! चूँकि मेरा सर दर्द से फट रहा था तो मैंने उसे चाय बनाने को कहा| चाय बना के वो लाई तो सबने चाय पि पर मेरे लिए वो चाय इतनी बेसुआद थी की क्या बताऊँ! मेरी जीभ का सारा स्वाद मर चूका था, इतना बुखार था मुझे| सब ने मुझे कहा की मैं डॉक्टर के चला जाऊँ पर मैंने कहा की आज की रात देखता हूँ! आखिर सब चले गए और ऋतू मुझे दूर किचन काउंटर से देख रही थी| 1 बजा था तो मैंने उसे हॉस्टल लौटने को कहा पर अब वो जिद्द पर अड़ गई| "जब तक आप ठीक नहीं हो जाते मैं कहीं नहीं जा रही!" उसने हक़ जताते हुए कहा|

"हेल्लो मैडम! आप यहाँ किस हक़ से रुके हो?" मैंने गुस्से से कहा| जो गुस्सा भड़का हुआ था वो अब धीरे-धीरे बाहर आने लगा था|  

"आपकी जीवन संगनी होने के रिश्ते से रुकी हूँ!" उसने बड़े गर्व से कहा|

" काहे की जीवन संगनी? जिसे अपने पति पर ही भरोसा नहीं वो काहे की जीवन संगनी?" मैंने एक ही जवाब ने उसका सारा गर्व तोड़ कर चकना चूर कर दिया|

"जानू! प्लीज!" उसने रोते हुए कहा|

"तुम्हारे इस रूखे पन से मैं कितना जला हूँ ये तुम्हें पता है? वो तुम्हारे कॉलेज के बाहर रोज आ कर रुकना इस उम्मीद में की तुम आ कर मेरे सीने से लग जाओगी! अरे गले लग्न तो छोडो तुमने तो एक पल के लिए बात तक नहीं की मुझसे! ऐसे इग्नोर कर दिया जैसे मेरा कोई वजूद ही नहीं है! कैसे की मैं तुम्हारे लिए कोई अनजान आदमी हूँ! मैं पूछता हूँ आखिर ऐसा कौन सा पाप कर दिया था मैंने? तुम्हें सब कुछ सच बताया सिर्फ इसलिए की हमारे रिश्ते में कोई गाँठ न पड़े और तुमने तो वो रिश्ता ही तार-तार कर दिया| जानता हूँ एक पराई औरत के साथ था पर मैंने उसे छुआ तक नहीं, उसके बारे में कोई गलत विचार तक नहीं आया मेरे मन में और जानती हो ये सब इसलिए मुमकिन हुआ क्योंकि मैं तुमसे प्यार करता हूँ| पर तुम्हें तो उस प्यार की कोई कदर ही नहीं थी| जब मुंबई गया था तब तुमने एक दिन भी मेरा कॉल उठा कर मुझसे बात नहीं की, सारा टाइम फ़ोन काट देती थी| पिछले दो हफ़्तों से तुम ने मेरा नंबर ब्लॉक कर दिया!!! किस गलती की सजा दे रही थी मुझे?" मेरे शूल से चुभते शब्दों ने ऋतू के कलेजे को छन्नी कर दिया था और वो बिलख-बिलख कर रोने लगी| "I’m …really ….very very…. sorry! मैंने आपको बहुत गलत समझा| ऋतू ने रोते हुए कहा| फिर उसने अपने आँसूँ पोछे और हिम्मत बटोरते हुए कहा; "उस दिन मैं आपके ऑफिस जान बुझ कर आई थी अनु मैडम से मिलना| मुझे देखना था ... जानना था की आखिर उसमें ऐसा क्या है जो मुझ में नहीं! पर उनसे बात कर के मुझे जरा भी नहीं लगा की उनका या आपका कोई चक्कर है! मैंने उनसे पूछा क्या आप उनके पति हो तो उनके चेहरे पर मुझे कोई शिकन या गिल्ट नहीं दिखा| मुझे वो बड़ी सुलझी और सभ्य लगीं, उस दिन मुझे खुद पर गुस्सा आया की मैंने उनके बारे में ऐसा कुछ सोचा| वो तो आपको सिर्फ अपना दोस्त मानती हैं! मुझे बहुत गिलटी हुई की मेरे इस बचपने की वजह से मैंने आपको इतना तड़पाया इतना दुःख दिया| आप चाहते तो वो सब उनके साथ कर सकते थे और मुझे इसकी जरा भी भनक नहीं होती| पर आपने सब सच बताया और यही सोच-सोच कर मैं शर्म से मरी जा रही थी| मुझे माफ़ कर दीजिये! मैं वादा करती हूँ की मैं आज के बाद कभी आप पर शक नहीं करुँगी|” 

मैंने उसकी बात का कोई जवाब नहीं दिया और बिस्तर से उठ के बाथरूम जाने को उठा तो एहसास हुआ की मुझे बहुत कमजोरी है| ऋतू तेजी से मेरे पास आई और मुझे सहारा दे कर उठाने लगी| बाथरूम से वापस भी उसी ने मुझे पलंग तक छोड़ा| मैं लेटा और लेटते ही सो गया और करीब घंटे भर बाद ऋतू ने मुझे खाना खाने को उठाया| "मैं खा लूँगा, तुम हॉस्टल वापस जाओ|" इतना कह के मैं उठ के बैठ गया, पर मेरी बातों से झलक रहे रूखेपन को ऋतू मेहसूस कर रही थी| वो दरवाजे तक गई और दरवाजे की चिटकनी लगा दी और मेरी तरफ देखते हुए अपनी कमर पर दोनों हाथ रख कर कड़ी हो गई; "मैं कहीं नहीं जाने वाली! जब तक आप तंदुरुस्त नहीं हो जाते मैं यहीं रहूँगी, आपके पास!"


"बकवास मत कर! हॉस्टल में क्या बोलेगी की रात भर कहाँ थी और घर पर ये खबर पहुँच गई ना तो तुझे घर बिठा देंगे, फिर भूल जाना पढ़ाई-लिखाई!" ये कहते-कहते मेरे सर में दर्द होने लगा तो मैं अपने दोनों हाथों से अपना सर पकड़ के बैठ गया| मेरा सर झुका हुआ था तो ऋतू मेरे नजदीक आई और मेरी ठुड्डी पकड़ के ऊपर उठाई और बोली; "मैंने आपके फोन से आंटी जी को फ़ोन कर दिया और उन्हें आपकी तबियत के बारे में सब बता दिया| उन्होंने कहा है की मैं यहाँ रुक सकती हूँ|” ये सुनते ही मुझे बहुत गुस्सा आया और मैंने अपनी गर्दन घुमा ली; “तेरा दिमाग ठिकाने है की नहीं?!” मैंने उसे गुस्से से डाँटा पर उसका उस पर कोई असर नहीं पड़ा, वो बस सर झुकाये वहीँ खड़ी रही| "तू क्यों सब कुछ तबाह करने पर तुली है? तुझे यहाँ आने के लिए किसने कहा था? कॉलेज में भी तेरी दोस्त का हमारे रिश्ते के बारे में तूने सब बता दिया और यहाँ भी सब को हमारे बारे में सब पता चल गया है, अब तू हॉस्टल नहीं जाएगी तो वो सब क्या सोचेंगे?"  माने उसे समझाया, जो शायद उसके दिमाग में घुसा या फिर वो मुझे मैनिपुलेट करते हुए बोली; "आज आपकी तबियत बहुत ख़राब है! मुझे बस आज का दिन रुकने दो, कल आपकी तबियत ठीक हो जाएगी तो मैं वापस चली जाऊँगी| प्लीज...." ऋतू ने हाथ जोड़ कर मुझसे मिन्नत करते हुए कहा| अब मैं थोड़ा पिघल गया और उसे रुकने की इजाजत दे दी| वो खुश हो गई और थाली में दाल-चावल परोस के लाई और खुद ही मुझे खिलाने लगी, मैंने मना किया की मैं खा लूँगा पर वो नहीं मानी| पहला कौर खाते ही मुझे एहसास हुआ की खाने में कोई टेस्ट ही नहीं है! बिलकुल बेस्वाद खाना! मेरी शक्ल से ही ऋतू को पता चल गया की खाने में कुछ तो गड़बड़ है तो उसने एक कौर खा के देखा और बोली; "नमक-मिर्च सब तो ठीक है?!" पर मैं समझ गया की बुखार के कारन ही मेरे मुँह से स्वाद चला गया है और इसलिए खाने का मन कतई नहीं हुआ| पर ऋतू ने प्यार से जोर-जबरदस्ती की और मुझे खाना खिला दिया| मैं बस खाने को पानी के साथ लील जाता की कम से कम पेट में चला जाए तो कुछ ताक़त आये|


खाना खा कर ऋतू ने मुझे क्रोसिन दी और मैं फिर से लेट गया और फिर सीधा शाम 5 बजे उठा| बुखार उतरा तो नहीं था बस कम हुआ था, तो मैंने ऋतू से कहा की वो हॉस्टल चली जाए| "आपका बुखार कम हुआ है उतरा नहीं है| रात में फिर से चढ़ गया तो?" उसने चिंता जताते हुए कहा| फिर वो पानी गर्म कर के लाई और उसने मुझे 'स्पंज बाथ' दिया और दूसरे कपडे दिए पहनने को| फिर वही बेस्वाद चाय पि, हम दोनों में अब बातें नहीं हो रही थी| ऋतू बीच-बीच में कुछ बात करती थी पर मैं उसका जवाब हाँ या ना में ही देता था| फिर वो रात का खाना बनाने लगी, पर मेरा मन अब कमरे में कैद होने से उचाट हो रहा था| मैं खिड़की पास खड़ा हो गया और ठंडी हवा का आनंद लेने लगा| ऋतू ने मुझे बैठने को एक कुर्सी दी और कुछ देर बाद वहाँ मोहिनी आ गई|      

                "अरे मानु जी! क्या हालत बना ली आपने?" उसकी आवाज सुनते ही मैं चौंक कर गया और उसकी तरफ हैरानी से देखने लगा| "दीदी ये तो बेहोश हो गए थे मकान मालिक से डुप्लीकेट चाभी ली और घर खोला तब ...." ऋतू के आगे बोलने से पहले ही मैं बोल पड़ा; "अब पहले से बेहतर हूँ, वैसे अच्छा हुआ तुम आ गई| जाते समय इसे साथ ले जाना|"

"अरे अभी तो आई हूँ? और आप जाने की बात आकर रहे हो? बड़े रूखे हो गए आप तो? कहाँ गए आपकी chivalry???" मोहिनी मुझे छेड़ते हुए बोली|

"chivalry से तौबा कर ली मैंने! खाया-पीया कुछ नहीं गिलास तोडा बारह आना|" मैंने ऋतू को टोंट मारते हुए कहा| ये सुन कर ऋतू ने मोहिनी से नजर बचा कर कान पकडे और दबे होठों से सॉरी बोला|

"ऐसा क्या होगया की हमारे chivalry के राजा ने तौबा कर ली? बैठ इधर ऋतू मैं तुझे एक किस्सा सुनाऊँ| बात तब की है जब हम दोनों कॉलेज में थे, पढ़ाई में मैं जीरो थी हाँ उसके आलावा कल्चरल प्रोग्राम में मैं हमेशा आगे रहती थी| बाकी सारे सब्जेक्ट्स तो मैं जैसे-तैसे संभाल लेती पर एकाउंट्स मेरे सर के ऊपर से जाता था और तुम्हारे चहु ठहरे एकाउंट्स के महारथी| मेरी माँ ने इन्हें मुझे पढ़ाने के लिए बोला वो भी घर आ कर| तो जनाब हमेशा मुझे 2 फुट की दूरी से पढ़ाते थे| ऐसा नहीं था की माँ का डर था बल्कि वो तो ज्यादातर बहार ही होती थीं पर मजाल है की कभी इन्होने वो दो फुट की दूरी बाल भर भी कम की हो! अब मुझे इनके मज़े लेने होते थे तो मैं जानबूझ कर कभी-कभी इनके नजदीक खिसक कर बैठ जाती और ये एक दम से पीछे सरक जाते| इनकी मेरे नजदीक आने से इतनी फटती थी की पूछ मत! पूरे कॉलेज को पता था की जनाब मुझे पढ़ाते हैं और वो सब पता नहीं क्या-क्या बोलते थे इन्हें| कइयों ने इन्हें चढ़ाया की आज तू मोहिनी का हाथ पकड़ ले और बोल दे उसे की तू उससे प्यार करता है, उसे मिनट नहीं लगेगा पिघलने में पर आज तक इन्होने कभी मुझसे कुछ नहीं कहा|"


ऋतू ये सब सुन कर हैरान थी क्योंकि मैंने उसे ये सब कभी नहीं बताया था, पर ये सुनने के बाद उसे बहुत बुरा लग रहा था की क्यों उसने मुझे पर शक किया| खेर चाय पीना और कुछ गप्पें मारने के बाद मोहिनी हँसती हुई  बोली; "चलो आपके बीमार पड़ने से एक तो बात अच्छी हुई, की इसी बहाने पता तो चल गया की आप रहते कहाँ हो?! अब तो आना-जाना लगा रहेगा|"

"अगर एक बार पूछ लेते तो मैं वैसे ही बता देता|" मैंने भी हँसते हुए बता दिया|

"अच्छा जी? चलो आगे से ध्यान रखूँगी| चल भई रितिका?"

"दीदी प्लीज मैं आज यहीं रुक जाऊँ? अभी बुखार सिर्फ कम हुआ है उतरा नहीं है, रात को तबियत ख़राब हो गई तो कौन यहाँ देखने वाला?" ऋतू ने मिन्नत करते हुए कहा|

"कोई जर्रूरत नहीं है, मैं ठीक हूँ|" मैंने उसी रूखेपन से जवाब दिया|

"कोई बात नहीं तू रुक जा यहाँ|" मोहिनी ने ऋतू के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा| फिर मेरी तरफ देख कर बोली; "आप ना ज्यादा उड़ो मत! वरना मैं भी यहीं रुक जाऊँगी| वैसे भी अब तो आपने chivalry से तौबा कर ही ली है, तो अब तो कोई दिक्कत नहीं होगी आपको?!" मोहिनी ने मुझे छेड़ते हुए कहा|     

"यार आप अब भी नहीं सुधरे!" मैंने हँसते हुए कहा|

"जो सुधर जाए वो मोहिनी थोड़े ही है|" इतना कह कर वो मुस्कुराते हुए चली गई| ये सब सुन कर अब तो जैसे ऋतू के मन में प्यार का सागर उमड़ पड़ा| उसने बड़े प्यार से खाना बनाया पर नाक बंद थी और जो थोड़ी-बहुत खुशबु मैं सूँघ पाया उससे लगा की खाना जबरदस्त बना होगा, पर जब ऋतू ने मुझे पहला कौर खिलाया तो वही बेस्वाद! जैसे -तैसे खाना निगल लिया और फिर ऋतू को खाने के लिए बोला| वो अपना खाना ले कर मेरे सामने बैठ गई और खाने लगी| खाने के बाद उसने मुझे फिर से क्रोसिन दी और हम दोनों लेट गए| रात के 1 बजे मुझे फिर से बुखार चढ़ गया और मैं बुरी तरह कँप-कँपाने लगा| ऋतू शायद जाग रही थी तो उसने मेरी कँप-कँपी सुनी और तुरंत लाइट जलाई और उठ कर मुझे पीठ के बल लिटाया| जैसे ही उसने मेरे माथे को छुआ तो वो चीख पड़ी; "हाय राम! अ...अ....आपका बदन तो भट्टी की तरह जल रहा है!" सबसे पहले उसने मुझे थोड़ा बिठाया और एक क्रोसिन की गोली दी फिर उसने आननफानन में सारी चादरें उठाई और एक-एक कर मुझ पर डाल दी| पर मैं अब भी काँप रहा था, ऋतू की आँखों से आँसूँ बहने लगे और जोर-जोर से मेरे हाथ और पाँव मलने लगी| जब उसे कुछ और नहीं सुझा तो वो उठी और आ कर मेरी बगल में लेट गई और मुझे उसने अपनी तरफ करवट करने को कहा| उसने मेरा मुँह अपनी छाती में दबा दिया और खुद मुझसे इस कदर लिपट गई जैसे की कोई जंगली बेल किसी पेड़ से लिपट जाती है| मैंने भी उसे कस कर जकड लिया और अपने ऊपर भी उसने वो चादरें डाल ली और मेरी पीठ रगड़ने लगी| उसकी सांसें तेज चलने लगी थी, वो घबरा रही थी की कहीं मैं मर गया तो? उसने बुदबुदाते हुए कहा; "मैं आपको कुछ नहीं होने दूँगी| प्लीज.....प्लीज... मुझे छोड़ कर मत जाना| आपके बिना मेरा कौन है? कैसे जीऊँगी मैं?" करीब एक घंटा लगा मेरे जिस्म पर दवाई का असर होने में और मेरी कँप-कँपी थम गई| ऋतू के सारे कपडे मेरे माथे और उसके जिस्म के पसीने से भीग चुके थे! धीरे-धीरे हम दोनों इसी तरह एक दूसरे की बाहों में सो गए| सुबह पाँच बजे मेरी आँख खुली और मैंने खुद को उसकी गिरफ्त से धीरे से छुड़ाया और उसके मस्तक पर चूमा| बुखार अब कम था पर मेरे होठों के एहसास से ऋतू जाग गई और मुझे जागता हुआ पा कर मेरी आँखों में देखते हुए पूछा; "अब आपकी तबियत कैसी है?" माने मुस्कुरा कर हाँ में गर्दन हिलाई और वो समझ गई की मैं ठीक हूँ| उसने मेरा माथा छुआ तो घबरा गई और बोली; "बुखार खत्म नहीं हुआ आपका! आज आपको मेरे साथ डॉक्टर के चलना होगा|" मैंने जवाब में बस हाँ कहा| कल तक मुझे जो गुस्सा ऋतू पर आ रहा था वो अब प्यार में बदल गया था| अब मैं उससे अब अच्छे से बात आकर रहा था और वो भी अब पहले की तरह खुश थी| नाश्ता कर के वो मेरे साथ हॉस्पिटल के लिए निकली पर मेरे जिस्म में ताक़त कम थी तो नीचे आ कर हमने फ़ौरन ऑटो किया और हॉस्पिटल पहुँचा| डॉक्टर ने चेक-अप किया और डेंगू का टेस्ट कराने को कहा| ये सुनते ही ऋतू बहुत घबरा गई, मानो की जैसे डॉक्टर ने कहा हो की मुझे कैंसर है| खेर ब्लड सैंपल देने के टाइम जब नर्स ने सुई लगाईं तो ऋतू से वो भी नहीं देखा गया और मुझे होने वाला उसके चेहरे पर दिखने लगा, उसका बचपना देख नर्स भी हँस पड़ी| खेर हम दवाई ले कर घर लौटे और रिपोर्ट कल सुबह आने वाली थी|
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update 21 

ऋतू बहुत घबराई हुई थी और मुझे उसकी घबराहट दूर करनी थी; "जान!" इतना सुनना था की वो भागती हुई आई और मेरे सीने से लग गई और फफक का करो पड़ी| "कान तरस गए थे आपके मुँह से ये सुनने को|" उसने रोते हुए कहा| "आपको कुछ हो जाता तो मैं खुद को कभी माफ़ नहीं करती| प्लीज मुझे माफ़ कर दो!" मैंने उसके सर को चूमा और उसे कस के अपनी छाती से चिपका लिया, तब जा कर उसका रोना कम हुआ| तभी अनु मैडम का फ़ोन बज उठा और फ़ोन ऋतू के हाथ के पास था और उसी ने मुझे फ़ोन उठा कर दिया| पर इस बार उसके मुँह पर जलन या कोई दुःख नहीं था| मैडम ने मेरा हालचाल पूछा पर मैंने उन्हें ये नहीं बताया की मैं यहीं शहर में हूँ वरना वो घर आती और फिर ऋतू को देख के हजार सवाल पूछती| जब उन्हें पता चला की मुझे डेंगू होने के चांस हैं तो वो भी घबरा गईं पर मैंने उन्हें ये झूठ बोल दिया की यहाँ सब परिवार वाले हैं मेरी देख-रेख करने को! ऋतू ये सब बड़ी गौर से सुन रही थी और जैसे ही मेरी बात खत्म हुई तो उसने पूछा की मैंने झूठ क्यों बोला; "mam यहाँ आ जाती तो तुम कहाँ छुपती?" ये सुन कर ऋतू को समझ आ गया और वो कुछ खाने के लिए बनाने लगी| फिर आस-पडोसी भी आये और मेरा हाल-चाल पूछने लगे| सुभाष जी तो ऋतू की तारीफ करते नहीं थक रहे थे! 

भाई ऐसा जीवन साथी तो बड़ी मुश्किल से मिलता है, जो लड़की शादी से पहले इतना ख्याल रखती हो वो भला शादी के बाद कितना ख्याल रखेगी?! ये सुन ऋतू के गाल शर्म से लाल हो गए|

"तुम दोनों जल्दी से शादी कर लो इसी बहाने बिल्डिंग में थोड़ी रौनक बनी रहेगी|" पांडेय जी ने कहा|

"जी अभी पहले ये अपनी पढ़ाई तो पूरी कर ले!" माने मुस्कुरा कर जवाब दिया तो ऋतू ने भाभी के कंधे पर अपना मुँह छुपा लिया, ये देख सब हँस पड़े| चाय पी कर सब गए तो ऋतू ने खाना बनाया और खुद अपने हाथ से मुझे खिलाया और आज तो मैंने भी उसे अपने हाथ से खिलाया| खाना खा कर ऋतू ने मुझे अपना सर उसकी गोद में रख कर लेटने को कहा| थोड़ी देर बाद दोनों की आँख लग गई और फिर जब मैं उठा तो ऋतू चाय बना के लाइ| चाय की चुस्की लेते हुए मैंने अपनी चिंता उस पर जाहिर की;

मैं: ऋतू....चीजें वैसे नहीं हो रही जैसी होनी चाहिए!

ऋतू: क्यों?? क्या हुआ?

मैं: मैं चाहता था की हमारा प्यार एक राज़ रहे तब तक जब तक की तुम अपने फाइनल ईयर के पेपर नहीं दे देती| पर यहाँ तो सबको पता चल चूका है!

ऋतू: कल जब मैं आपसे मिलने आई तो मैं 20 मिनट तक आपका दरवाजा खटखटाती रही, आपको दसियों दफा कॉल किया पर आप ने कोई जवाब ही नहीं दिया| मेरा मन अंदर से कितना घबरा रहा था ये आप सोच भी नहीं सकते! कलेजा मुँह को आ गया था, लगता था की हमारा साथ छूट गया और वो भी सिर्फ मेरी वजह से! मैंने हार कर पड़ोसियों से पूछा तो उन्होंने कहा की मकान मालिक के पास डुप्लीकेट चाभी है| मैंने उनसे ये कहा की मैं आपकी मंगेतर हूँ और आपसे मिलने आई हूँ, तब जा कर उन्हें मेरी बात का भरोसा हुआ| कॉलेज में मेरी सिर्फ और सिर्फ एक दोस्त है काम्या, वो भी आपके बारे में ज्यादा नहीं जानती| मैंने उसे बीएस इतना बताया की आप एक ऑफिस में जॉब करते हो, इससे ज्यादा जब भी वो पूछती है तो मैं बात टाल जाती हूँ| उस दिन सूमो भय भी शायद जान या समझ चुके हों, क्योंकि उनका भाई तो अब हमारे कॉलेज में नहीं पढता| हॉस्टल में मैं किसी से ज्यादा बात नहीं करती, जी लगा कर पढ़ती हूँ तो इसलिए किसी को हमारे रिश्ते के बारे में भनक तक नहीं|  हम एक समाज में रहते हैं, अब मिलेंगे तो लोग देखेंगे ही और बिना मिले तो मैं आपसे रह नहीं सकती!

मैं: और तुम्हारी पढ़ाई का क्या?

ऋतू: आपसे किया वादा मुझे याद है!

ये सुन कर मैं थोड़ा निश्चिन्त हुआ पर फिर भी एक डर तो था की अगर बात खुल गई तो ऋतू की पढ़ाई ख़राब हो जाएगी, पर फिर सोचा की जो होगा देखा जायेगा! वो रात बड़े प्यार से बीती, सोने के समय आज भी ऋतू ने मुझे कल की तरह अपने सीने से चिपका लिया और गहरी सांसें लेते हुए सो गई| मैं समझ रहा था की मेरे इतने करीब होने से उसके जिस्म में क्या उथल-पुथल मची हुई है पर मैं अभी इतना स्वस्थ नहीं हुआ था की उसके साथ सेक्स कर सकूँ! आज दो बार दवाई लेने से ये फायदा हुआ था की अब बुखार नहीं था, बॉडी अब भी रिकवर कर रही थी| अगले दिन रिपोर्ट आई और हुआ भी वही जो डॉक्टर ने कहा था| डेंगू! डॉक्टर ने खूब साड़ी दवाइयाँ लिख दी, बुखार रोकने से ले कर मल्टी विटामिन तक! गोलियां भी रिवाल्वर के कारतूस के साइज की! अगले तीन दिन तक ऋतू ने मेरी बहुत देखभाल की और मेरे कई बार उसे हॉस्टल जाने के आग्रह करने के बाद भी उसने मेरी बात नहीं मानी| बुखार अब नहीं था पर कमजोरी बहुत थी मेरा प्लेटलेट काउंट काफी गिर चूका था, ये तो ऋतू 4 टाइम खाना बना कर मुझे खिला रही थी तो ज्यादा घबराने वाली बात नहीं थी| रात में सोने के समय रोज ऋतू मुझे अपने सीने से चिपका कर सोती, रोज रात को मेरी आँखों के सामने उसके स्तनों की घाटी होती और सुबह आँख खुलते ही मुझे फिर वही घाटी दिखती|
मोहिनी भी मुझे से मिलने रोज आई और अपने साथ फ्रूट्स लाती और वही हँसी-मज़ाक चलता रहा| तीसरे दिन तो आंटी जी भी आ गईं और उन्होंने भी ऋतू की बहुत तारीफ की; "भाई भतीजी हो तो ऋतू जैसी की अपने चाचा का इतना ख़याल रखती है|" ये सुन कर ऋतू को उतना अच्छा नहीं लगा जितना सुभाष अंकल की तारीफ करने से हुई थी| अब उन्होंने तो ऋतू को मेरी मंगेतर माना था और आंटी जी ने उसे भतीजी! "माँ सेवा करेगी ही, इसके चाचू ने भी इसका कम ख्याल रखा है? स्कूल से लेकर एक ये ही तो हैं जो इसे पढ़ा रहे हैं|" मोहिनी की बात सुन कर ऋतू खुद को बोलने से नहीं रोक पाई; "आंटी जी घर में सिर्फ और सिर्फ ये ही हैं जिन्होंने मुझे बचपन से लेकर अब तक पढ़ाया है| दसवीं और बारहवीं मैं इन्हीं की वजह से पढ़ पाई वरना घरवाले तो सब पीछे पड़े थे की ब्याह कर ले|"


नोट करने वाली बात ये थी की ऋतू ने मुझे एक बार भी 'चाचू' नहीं बोला था और मैं ये बात समझ चूका था पर डर रहा था की आंटी ये बात पकड़ न लें| शुक्र है की उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया! उनके जाने के बाद मुझे ध्यान आया की घर में मेरी तबियत के बारे में किसी को पता है या नहीं? क्या ऋतू ने किसी को बताया?

"ऋतू, तूने घर में फ़ोन किया था?" मैंने ऋतू से घबराते हुए पूछा|

"नहीं... मुझे याद नहीं रहा|" ऋतू का जवाब सुन कर मैं गंभीर हो गया| मैंने तुरंत फ़ोन घर मिला दिया ये जानने के लिए की कहीं कोई गड़बड़ तो नहीं है? पर शुक्र है की कोई घबराने की बात नहीं थी| मैं ने राहत की साँस ली और ऋतू को बताया की आगे से ये बात कभी मत भूलना| मुझे जर्रूर याद दिला देना वरना वो लोग अगर हॉस्टल पहुँच गए तो बखेड़ा खड़ा हो जायेगा| उसने हाँ में सर हिलाया उसने भी चैन की साँस ली| आज रात सोने के समय भी उसने ठीक वही किया, मेरा सर अपने सीने से लगा कर वो लेट गई| मैं इतने दिनों से उसके जिस्म की गर्मी को महसूस कर पा रहा था, पर मजबूर था की कुछ कर नहीं सकता था| आज मैंने ठान लिया था की इतने दिनों से ऋतू मेरी तीमारदारी में लगी है तो उसे थोड़ा खुश करना तो बनता है| मैंने ऋतू के स्तनों की घाटी को अपने होठों से चूमा तो उसकी सिसकारी फुट पड़ी; "ससससस...अ..ह...हह" और वो हैरत से मेरी तरफ देखने लगी| मुझे ऐसा लगा जैसे वो मुझसे मिन्नत कर रही हो की मैं उसकी इस आग का कुछ करूँ| मैंने थोड़ा ऊपर आते हुए उसके गुलाबी होठों को चूम लिया, आगे मेरे कुछ करने से पहले ही ऋतू के अंदर की आग प्रगाढ़ रूप धारण कर चुकी थी| उसने गप्प से अपने होठों और जीभ के साथ मेरे होठों पर हमला कर दिया| उसकी जीभ अपने आप ही मेरे मुँह में घुस गई और मेरी जीभ से लड़ने लगी| मैंने भी अपने दोनों हाथों से उसके चेहरे को थामा और अपने होठों से उसके निचले होंठ को मुँह में भर चूसने लगा| ये मेरा सबसे मन पसंद होंठ था और मैं हमेशा उसके नीचले होंठ को ही सबसे ज्यादा चूसता था| दो मिनट तक मैं बीएस उसके निचले होंठ को चुस्त रहा और जब जी भर गया तो अपनी जीभ और निचले होठ की मदद से उसके ऊपर वाले होंठ को मुँह में भर के चूसने लगा| जीभ से मैं उसके ऊपर वाले मसूड़ों को भी छेड़ दिया करता| इधर ऋतू के हाथों ने अपनी हरकतें शुरू कर दी, सबसे पहले तो वो मेरी टी-शर्ट को उतारने की जद्दोजहद करने लगे| पर मैंने अपने हाथों से उसे रोक दिया और वापस उसके चेहरे को थाम लिया और अपनी जीभ और होठों से उसके होठों को बारी-बारी चुस्त रहा| ऋतू को इसमें बहुत मजा आ रहा था पर उसे चाहिए था मेरा लंड, जो मैं उसे दे नहीं सकता था! मैंने उसके होठों को चूसना रोका और उसके चेहरे को थामे हुए ही कहा; "अपना पाजामा निकाल और जो मैं कह रहा हूँ वो करती जा|" मेरी बात सुन उसने लेटे-लेटे अपनी पजामी का नाडा खोल दिया और उसे अपनी गांड से नीचे करते हुए उतार फेंक दिया और बेसब्री से मेरे अगले आदेश का इंतजार करने लगी| मैं सीधा लेट गया, पीठ के बल उसे और मेरे दोनों तरफ टांग कर के मेरे पेट पर बैठने को कहा| ऋतू तुरंत उठ कर वैसे ही बैठ गई, फिर मैंने उसके कूल्हों पर अपना हाथ रखा और उसे धीरे-धीरे सरक कर मेरे सर की तरफ आने को कहा| वो भी धीरे-धीरे कर के ठीक मेरे मुँह के ऊपर आ कर उकडून हो कर बैठ गई| कमरे में अँधेरा था इसलिए न तो मैं और न वो मेरी शक्ल और भावों को देख पा रही थे| जैसे ही मेरी जीभ ने उसकी बुर के कपालों को छुआ तो वो चिंहुँक उठी और ऊपर की ओर हवा में उचक गई| 
मैंने उसकी जनघ पर हाथ रख कर उसे मेरे मुँह पर बैठने को कहा और तब जा कर वो नीचे वापस मेरे मुँह पर बैठ गई| मैंने अपने हाथों से उसकी जांघों को पकड़ लिया ताकि वो और न उचक जाए| मैंने फिर से ऋतू के बुर के कपालों को जीभ से छेड़ा पर इस बार वो ऊपर नहीं उचकी| अब मैंने अपने होठों से उन कपालों को पकड़ लिया और नीचे की तरफ खींचने लगा, ऋतू को हो रहे मीठे दर्द के कारन उसके मुँह से 'आह' निकल गई| उसने अपने दोनों हाथों से मेरे सर को थाम लिया और दबाव देकर अपने बुर को मेरे मुँह पर रगड़ना चाहा" पर मैंने उसे ऐसा करने से रोक दिया, अपने दोनों हाथों को मैं उसकी जांघ से हटा कर उसके बुर के इर्द-गिर्द इस कदर सेट किया की मेरे दोनों हाथों के बीच उसकी बुर थी| ऋतू का उतावलापन बढ़ने लगा था और मैं उसे रो रहा था ताकि वो ज्यादा से ज्यादा मजा ले सके| मैंने ऋतू के कपालों को होठ से चूसना शुरू कर दिया था और इधर ऋतू अपनी कमर मटका रही थी ताकि वो अपनी बुर को और अंदर मेरे मुँह में घुसा दे!



मैंने जितना हो सके उतना अपना मुँह खोला, ऋतू की बुर को जितना मुँह में भर सकता था उतना मुँह में भरा और अपनी जीभ उसके बुर में घुसा दी| मेरी जीभ उसके बुर के कपालों के बीच से अपना रास्ता बना कर जितना अंदर जा सकती थी उतना चली गई| "स्स्स्सस्स्स्स...आअह्ह्ह्हह" इस आवाज के साथ ऋतू ने मेरी जीभ का अपनी बुर में स्वागत किया| मैंने अपनी जीभ अंदर-बाहर करनी शुरू कर दी और इधर ऋतू बेकाबू होने लगी| उसने अपनी कमर इधर-उधर मटकाना शुरू कर दी और अपने हाथों से  मेरे सर के बाल पकड़ के खींचने लगी| इधर मेरी जीभ अंदर-बहार हो रही थी और उधर ऋतू ने अपनी कमर को आगे-पीछे हिलाना शुरू कर दिया| हम दोनों एक ऐसे पॉइंट पर पहुँच गए जहाँ मेरी जीभ और ऋतू की कमर लय बद्ध तर्रेके से आगे-पीछे हो रहे थे| 5-7 मिनट और ऋतू की बुर से रस निकल पड़ा जो मेरे मुँह में भरने लगा| ऋतू ने अपनी दोनों टांगें चौड़ी की और अपने बुर को मेरे मुँह पर दबा दिया और सारा रस मेरे मुँह में उतर गया| अपना सारा रस मुझे पिला कर वो नीचे खिसकी और अपनी बुर को ठीक मेरे लंड पर रख कर वो मेरे ऊपर लुढ़क गई| उसकी सांसें तेज हो चुकी थी और पसीनों की बूंदों ने उसके मस्तक पर बहना शुरू कर दिया था| दस मिनट बाद जब उसकी सांसें नार्मल हुई तो वो बोली; "Thank You!!!" मैंने उसके मस्तक को चूम लिया और उसे अपनी बाहों में भर लिया| उसके बाद तो ऋतू को बड़ी चैन की नींद आई, ऐसी नींद की वो सारी रात मेरी छाती पर सर रख कर ही सोई| सुबह मैंने ही उसे जगाया वो भी उसके सर को चूम कर|
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update 22 

 "हाय! क्या शुरुवात हुई है सुबह की!" ऋतू ने मेरी छाती पर लेटे हुए ही अंगड़ाई लेते हुए कहा|  फिर वो उठी और उसकी नजर अपनी पजामी पर पड़ी जो फर्श पर पड़ी थी| उसने वो उठा कर पहना और बाथरूम में नहाने चली गई| मोहिनी ने उसके कुछ कपडे ला दिए थे जिन्हें पहन कर ऋतू बाहर आई| आज तो मेरा भी मन नहाने का था पर ठन्डे पानी से नहाने के बजाये आज मुझे गर्म पानी मिला नहाने को| जब मैं नहा कर बाहर निकला तो ऋतू गुम-शूम दिखी, मैंने उसे हमेशा की तरह पीछे से पकड़ लिया और अपने हाथ को उसके पेट पर लॉक कर दिया|

मैं: क्या हुआ मेरी जानेमन को?

ऋतू: मैं बहुत सेल्फिश हूँ!

मैं: क्यों? ऐसा क्या किया तुमने?

ऋतू: कल रात को..... आपने तो मुझे सटिस्फाय कर दिया.... पर मैंने नहीं.... (ऋतू ने शर्माते हुए कहा|)

मैं: अरे तो क्या हुआ? दिन भर मेरा ख्याल रखती हो, तक गई थी इसलिए सो गई| इसमें मायूस होने की क्या बात है?

ऋतू: नहीं...  मैं....

मैं: पागल मत बन! अभी मेरी तबियत पूरी तरह ठीक नहीं है, जब ठीक हो जाऊँगा ना तब जितना चाहे उतना सटिस्फाय कर लेना मुझे!


मैंने उसे छेड़ते हुए कहा और ऋतू भी हँस पड़ी|

मैं: तू इतने दिनों से कॉलेज नहीं जा रही है, तेरी पढ़ाई का नुक्सान हो रहा होगा इसलिए कल से कॉलेज जाना शुरू कर|

ऋतू: आप पढ़ाई की चिंता मत करो! मैं सारा कवर-अप कर लूँगी!

मैं: ऋतू... बात को समझा कर! तकरीबन एक हफ्ता होने को आया है, आंटी जी और मोहिनी क्या सोचते होंगे? मेरी बात मान और कल से कॉलेज जाना शुरू कर और मेरी चिंता मत कर मैं घर चला जाता हूँ| वैसे भी पिताजी को मेरी तबियत के बारे में कुछ मालूम नहीं है, ऐसे में कुछ दिन वहाँ रुकूँगा तो बात बिगड़ेगी नहीं|

ऋतू ने बहुत ना-नुकुर की पर मैंने उसे मना ही लिया| शाम को जब मोहिनी आई तो मैंने उसे ऋतू को साथ ले जाने को कहा;

मोहिनी: अरे ऋतू चली गई तो आपका ध्यान कौन रखेगा?

मैं: मैं कल सुबह घर जा रहा हूँ वहाँ सब लोग हैं मेरा ख्याल रखने को| मैं तो संडे ही निकल जाता पर तबियत बहुत ज्यादा ख़राब थी!

खेर ऋतू अपना मन मारकर चली गई और उसने जो खाना बनाया था वही खा कर मैं सो गया| पिताजी को फ़ोन कर दिया था और वो मुझे लेने बस स्टैंड आ रहे थे| 4 घंटों का थकावट भरा सफर क्र मैं गाँव के बस स्टैंड पहुँचा जहाँ पिताजी पहले से ही मौजूद थे| उन्हें नहीं पता था की मेरी तबियत इतनी खराब है की बस स्टैंड से घर तक का रास्ता जो की 15 मिनट का था उसे मैंने 5 बार रुक-रुक कर आधे घंटे में तय किया| घर जाते ही मैं बिस्तर पर जा गिरा|         

                              कमजोरी इतनी थी की बयान करना मुश्किल था, ऋतू ने मुझे शाम को फ़ोन किया पर मैं दपहर को खाना खा कर सो रहा था| मेरे फ़ोन ना उठाने से वो बहुत परेशान हो गई और धड़ाधड़ मैसेज करने लगी, पर डाटा बंद था इसलिए मैसेज भी seen नहीं थे| वो बेचैन होने लगी और दुआ करने लगी की मैं ठीक-ठाक हूँ| रात को आठ बजे मैं उठा तब मैंने फ़ोन देखा और फटाफट ऋतू को फ़ोन किया| "मैंने कहा था न की मैं आपकी देखभाल करुँगी, पर आपने जबरदस्ती मुझे खुद से दूर कर दिया! देखो आपकी तबियत कितनी ख़राब हो गई! आपने फ़ोन नहीं उठाया तो मैंने मजबूरन घर फ़ोन किया और तब मुझे पता चला की आपकी कमजोरी और बढ़ गई है!" ऋतू ने रोते-रोते खुसफुसाते हुए कहा|

"जान! मैं ठीक हूँ! उस टाइम थकावट हो गई थी, पर अब खाना खा कर दवाई ले चूका हूँ| तुम मेरी चिंता मत करो!" मैंने उसे तसल्ली देते हुए कहा|

"आपने जान निकाल दी थी मेरी! जल्दी से ऑनलाइन आओ मुझे आपको देखना है!" इतना कह कर ऋतू ने फ़ोन रख दिया और मैंने अपने हेडफोन्स लगाए और ऑनलाइन आ गया| ऋतू हमेशा की तरह बाथरूम में हेडफोन्स लगाए हुए मुझसे वीडियो कॉल पर बात करने लगी| बहुत सारे kisses मुझे दे कर उसे चैन आया और फिर रात को चाट करने के लिए बोल कर चली गई| रात दस नाज़े से वो मेरे साथ चाट पर लग गई और 12 बजे मैंने ही उसे सोने को कहा ताकि उसकी नींद पूरी हो| इधर मैं फ़ोन रख कर सोने लगा की तभी मूत आ गया| मैंने सोचा बजाये नीचे जाने के क्यों न छत पर ही चला जाऊँ| जब मैं छोटा था तो कभी-कभी रात को छत की मुंडेर पर खड़ा हो जाता और अपने पेशाब की धार नीचे गिराता| यही बचपना मुझे याद आ गया तो मैं भी मुस्कुराते हुए छत पर आ गया और अपना लंड निकाल कर मुंडेर पर चढ़ गया और मूतने लगा| जब मूत लिया तो मैं पीछे घुमा और वहाँ जो खड़ा था उसे देखते ही मेरी सिट्टी-पिट्टी गुल हो गई|

                                 पीछे भाभी खड़ी थी और उनकी नजर मेरा लंड पर टिकी थी| जब मेरी नजरें उनकी नजरों का पीछा करते हुए मेरे ही लंड तक आई तो मैंने फट से लंड पाजामे में डाला और मुंडेर से नीचे आ गया| मैं बुरी तरह से झेंप गया था और वापस अपने कमरे की तरफ जा रहा था| इतने में पीछे से भाभी बोली; "मुझे तो लगा था की तुम आत्महत्या करने जा रहे हो, पर तुम तो मूत रहे थे! बचपना गया नहीं तुम्हारा देवर जी!" ये सुन कर मैं एक पल को रुका पर पलटा नहीं और सीधा आँगन में आ गया, हाथ-मुँह धोया और वापस कमरे में जाने लगा की तभी भाभी ऋतू वाले कमरे के बाहर अपनी कमर पर हाथ रखे मेरा इंतजार कर रही थी| "तन से तो जवान हो गए, पर मन से अब भी बच्चे हो!| उन्होंने हँसते हुए कहा| मैं अब भी शर्मा रहा था तो सर झुका कर अपने कमरे में घुस गया और वो ऋतू वाले कमरे में घुस गईं| लेटते ही मुझे ऋतू की वो बात याद आई जिसमें भाभी मेरे बारे में सोच के नींद में मेरा नाम बड़बड़ा रही थी| आज उन्होंने ने जिस तरह से मुझे 'देवर जी' कहा था वो भी बहुत कामुक था! मैं सचेत हो चूका था और मेरा मन भाभी के जिस्म की प्यास को महसूस करने लगा था, पर ऋतू का प्यार मुझे गलत रास्ते में भटकने नहीं दे रहा था| अगले कुछ दिन तक भाभी मेरे साथ यही आँख में चोली का खेल खेलती रही और सबकी नजरें बचा कर मुझे अपने जिस्म की नुमाइश आकृति रही| जब भी मैं अपने कमरे में अकेला होता तो वो झाड़ू लगाने के बहाने आती और अपने पल्लू को अपने स्तनों पर से हटा के अपनी कमर से लपेट लेती| उसके स्तनों की वो घाटी इतनी गहरी थी जिसका अंदाजा लगाना मुश्किल था| भाभी की 44D साइज की छातियाँ दूध से भरी लगती थी, 37 की उम्र में भी उसकी छातियों में बहुत कसावट थी| झाड़ू लगाते हुए वो मेरे पलंग के नजदीक आ गई और इतना झुक गई की मुझे उनके निप्पल लग-भग दिख हो गए| मैं उठ के जाने को हुआ तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया; "कहाँ जा रहे हो देवर जी?!" मैंने कोई जवाब नहीं दिया और मुँह फेर लिया| "मेरा तो काम हो गया!" इतना कह कर उन्होंने मेरा हाथ छोड़ दिया और अपनी कातिल हंसी हँसते हुए चली गई| उनकी ये डबल मीनिंग वाली बात मैं समझ चूका था, वो तो बस मुझे अपने स्तन दिखाने आई थीं!  कमरा तक ठीक से साफ़ नहीं किया था उन्होंने, पहले तो सोचा की उन्हें टोक दूँ पर फिर चुप रहा और वापस लेट गया| वो पूरा दिन भाभी मुझे देख-देख आकर हँसती रही और मेरे जिस्म में आग पैदा हो इसकी कोशिश करती रही| अगले दिन भी कुछ ऐसा ही हुआ, मैं आँगन में लेटा हुआ था और वो हैंडपंप के पास उकडून हो कर बैठी कपडे धो रही थी| मैं जहाँ लेटा था वहाँ मेरे बाएं तरफ रसोई और दाएं तरफ गुसलखाना था जहाँ पर हैंडपंप लगा था| मैं पीठ के बल लेटा हुआ था और अपने फ़ोन में कुछ देख रहा था की मैंने 'गलती' से दायीं तरफ करवट ली| करवट लेते ही मेरी नजर अचानक से भाभी पर पड़ी जो मेरी तरफ देख रही थी और उनका निचला होंठ उनके दाँतों तले दबा हुआ था| उनकी दायीं टाँग सीधी थी और उन्होंने उसके ऊपर से अपने पेटीकोट ऊपर चढ़ा रखा था| भाभी मेरी तरफ प्यासी नजरों से देख रही थी और सोच रही थी की मैं उठ कर आऊँगा और उन्हें गोद में उठा कर ले जाऊँगा|

भाभी ने अपना पेटीकोट और ऊपर चढ़ा दिया और उनकी माँसल जाँघ मुझे दिखने लगी| ये देखते ही मुझे झटका लगा और मैंने तुरंत दूसरी तरफ करवट आकर ली और ये देख आकर भाभी खिलखिलाकर हँस पड़ी| रात खाने के बाद मैं छत पर थोड़ा टहल रहा था की तभी ऋतू का फ़ोन आ गया और मैं उससे बात करने लगा| बात करते-करते रात के 11 बज गए, मैंने ऋतू को बाय कहा और फ़ोन पर एक लम्बी सी Kiss दी और फ़ोन रखा| मौसम अच्छा था, ठंडी-ठंडी हवाएँ जिस्म को छू रही थी और मजा बहुत आ रहा था| मैंने सोचा की आज यहीं सो जाता हूँ, पास ही एक चारपाई खड़ी थी तो मैं ने वही बिछाई और मैं दोनों हाथ अपने सर के नीचे रख सो गया| रात के एक बजे मेरे कान में भाभी की मादक आवाज पड़ी; "देवर जी!!!" ये सुनते ही मैं चौंक कर उठ गया और सामने देखा तो भाभी दिर्फ़ ब्लाउज और पेटीकोट में मेरे सामने खड़ी हैं| पूनम के चाँद की रौशनी में उनका पूरा बदन जगमगा रहा था| 38 इंची की कमर और उनकी 44D की छातियाँ मेरे ऊपर कहर ढा रही थी! मेरी नजरें अपने आप ही उनकी ऊपर-नीचे होती छातियों पर गाड़ी हुई थी| भाभी जानती थी की मैं कहाँ देख रहा हूँ इसलिए वो और जोर से सांसें लेने लगीं| दिमाग में फिर से झटका लगा और मैं ने उनकी मन्त्र-मुग्ध करती छातियों से अपनी नजरें फेर ली| "यहाँ क्या कर रहे हो देवर जी?" भाभी ने फिर से उसी मादक आवाज में कहा|

"वो मौसम अच्छा था इसलिए ...." मैंने उनसे मुँह फेरे हुए ही कहा| "हाय!!!...सच कहा देवर जी! सससस...ठंडी-ठंडी हवा तो मेरे बदन पर जादू कर रही है| मैं भी यहीं सो जाऊँ?" भाभी की सिसकी सुन मैं उठ खड़ा हुआ और नीचे जाने लगा| "आप चले जाओगे तो मैं कहाँ सोऊँगी?" भाभी बोलती रही पर मैं रुका नहीं और अपने कमरे में आ कर दरवाजा बंद कर के लेट गया| भाभी का मुझे रिझाने का काम पूरे 5 दिन और चला और इन्हीं दिनों मैं इतना तंदुरुस्त हो गया की अपना ख्याल रख सकूँ! घर के असली दूध-दही-घी की ताक़त से जिस्म में जान आ गई थी| अब मुझे वहाँ से जल्दी से जल्दी निकलना था वरना भाभी मेरे लंड पर चढ़ ही जाती! एक हफ्ते बाद में वापस शहर पहुँचा तो मेरा प्यार मुझे लेने के लिए बस स्टैंड आया था| ऋतू मुझे देखते ही मेरे गले लग गई और उसकी पकड़ देखते ही देखते कसने लगी| "जानू! पूरे दस दिन आप मुझसे दूर रहे हो! आगे से कभी बीमार पड़े ना तो देख लेना! मैं भी आपके ही बगल में लेट जाऊँगी!" ये सुन कर मैं हँस पड़ा, हम घर पहुँचे और ऋतू के हाथ का खाना खा कर मन प्रसन्न हो गया| मैंने जान कर ऋतू को भाभी द्वारा की गई हरकतों के बारे में कुछ नहीं बताया वरना फिर वही काण्ड होता! इन पंद्रह दिनों में मैं बहुत कमजोर हो गया था इसीलिए उस दिन ऋतू ने मेरे ज्यादा करीब आने की कोशिश नहीं की| अगले दिन मैंने ऑफिस ज्वाइन किया तो मेरी कमजोरी अनु मैडम से छुपी नहीं और वो कहने लगी की मुझे कुछ और दिन आराम करना चाहिए, अब तो राखी ने भी ज्वाइन कर लिया था और भी मैडम की बात को ही दोहराने लगी| सिर्फ एक मेरा बॉस था जो मन ही मन गालियाँ दे रहा था|                       
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update 23 

उस दिन मैं शाम को ऋतू से मिल नहीं पाया क्योंकि काम बहुत ज्यादा था और राखी मैडम से बैलेंस शीट फाइनल नहीं हो रही थी तो मुझे उसकी मदद करनी पड़ी| शाम को देर हो गई थी इसलिए मैंने ही उसे घर ड्राप किया था| अगले दिन मुझे ऋतू का फ़ोन आया तो वो बहुत घबराई हुई थी!

मैं: क्या हुआ? तू घबराई हुई क्यों है?

ऋतू: I….I…. I think I’m preganant!!!

मैं: WHAT???!!!! H….How…. this … happened?!

ऋतू:  I missed …..my periods!

ये सुन कर दोनों खामोश हो गए, मेरा दिमाग तो जैसे सुन्न हो चूका था| 
ऋतू: जानू! हेल्लो???? जानू????


ऋतू की आवाज सुन कर मैं अपनी सोच से बाहर निकला;

मैं: मैं आ रहा हूँ तेरे कॉलेज, मुझे लाल बत्ती पर मिल|

इतना कह कर मैं ऑफिस से भागा, मैडम ने मुझे भागते हुए देखा तो तुरंत मुझे कॉल कर दिया| मैं अभी बाइक के पास ही पहुँचा था| मैंने उन्हें झूठ बोल दिया की परिवार के किसी लड़के को हॉस्पिटल लाये हैं| मैं बाइक भगाता हुआ कॉलेज पहुँचा और ऋतू वहीँ इंतजार कर रही थी| मैं उसे ले कर शहर के दवाखाने नहीं जा सकता था वरना कल को कोई काण्ड अवश्य होता| इसलिए मैं उसे ले कर बाराबंकी आ गया| दो घंटे के रास्ते में हमारी कोई भी बात नहीं हुई, ऋतू मेरे जिस्म से चिपकी बस सुबक रही थी| उसकी आँख के आँसू मेरी कमीज पीछे से भीगा रहे थे| शहर में घुसते ही पहले मैंने ऋतू को एक मंगलसूत्र खरीद कर दिया और साथ ही मैं सिंदूर की एक डिब्बी| ऋतू हैरानी से मेरी तरफ देखने लगी;

ऋतू: हम शादी कर रहे हैं? (उसने खुश होते हुए कहा|)

मैं: नहीं! ये सिन्दूर लगा ले और मंगलसूत्र पहन ले अगर डॉक्टर पूछे तो कहना की हमारी शादी को 5 महीने ही हुए हैं|     

ये सुन कर ऋतू मायूस हो गई, पर मेरा ध्यान अभी सिर्फ इस बात को जानने में था की क्या वो प्रेग्नेंट है? दिमाग तैयारी करने लगा था की अगर वो प्रेग्नेंट है तो मुझे उसके साथ जल्द से जल्द भागना होगा! एक महंगे से हॉस्पिटल के बाहर मैंने बाइक रोकी और फिर हम दोनों अंदर पहुँचे| कार्ड बनवा कर हम बीअत गए, डिटेल में मैंने अपना नंबर डाला और ऋतू का नाम बदल कर प्रिया कर दिया|  कुछ देर इंतजार करने के बाद हम डॉक्टर के केबिन में घुसे और डॉक्टर ने हम दोनों का नाम पूछा तो मैंने उन्हें अपना नाम रितेश बताया| ये सुन कर ऋतू थोड़ा हैरान हुई क्योंकि मैं ऋतू को नकली नाम बताना भूल गया था| मैंने ऋतू का हाथ दबा कर उसे समझा दिया|

डॉक्टर: तो बताइये मिस्टर शुभम क्या समस्या है?

मैं: जी mam ... मुझे लगता है की प्रिया प्रेग्नेंट है... और अभी हम दोनों ही जॉब कर रहे हैं तो....I hope you can understand!

डॉक्टर: Yeah ... Yeah .... प्रिया आप चलो मेरे साथ|

ऋतू उठ कर उनके साथ चली गई और करीब 15 मिनट बाद डॉक्टर और ऋतू साथ आये|

डॉक्टर: You should have used precaution!

मैं: Mam ... वो... Sorry! पर ऋतू ने I-pill तो ली थी|

डॉक्टर: 72 घंटों के अंदर ली थी?

मैं: नहीं mam .... थोड़ा लेट हो गई थी!

डॉक्टर: देखो इस समय ऋतू के साथ थोड़ी कम्प्लीकेशन है! She's not physically fit to be a mom! Also, you can’t choose the abortion… cause then she won’t be able to conceive …ever!
ये सुन कर हम दोनों के दूसरे को देखने लगे और हमारी परेशानियाँ हमारी शक्ल से दिख रही थी|


डॉक्टर: See I’ll write some medication which she has to take on a daily basis, this will only delay the pregnancy. If she stopped the medication, then she’ll have to conceive the baby. She also needs multi-vitamins to be physically fit in order to … you know… be a mom. One more thing I’d like to ask, how long have you been married? 
मैं: 5 months! But why?


डॉक्टर: You didn’t tell me anything about your wife’s orgasms?

अब ये सुन कर तो मैं दंग रह गया!

मैं: I thought they’re natural…..I….I had no idea…. its …a disease?!!
डॉक्टर:  It’s not a disease … yes she reaches orgasm a bit early but don’t worry I’ve taught her a technique to last longer! 


ये कहते हुए उन्होंने ऋतू को आँख मारी! खेर हम दवाई ले कर बाहर आये और दोनों भूखे थे तो मैंने ऋतू को एक रेस्टुरेंट में चलने को कहा| वहाँ खाना आर्डर कर ने के बाद हमने बात शुरू की;

मैं; घबराओ मत! सब कुछ ठीक हो जायेगा|

ऋतू: सब मेरी गलती थी, मैं अगर दवाई टाइम पर ले लेती तो ये सब नहीं होता!

मैं: जो हो गया सो हो गया! अब ये दवाई टाइम से खाना और ये बताओ की तुम अंदर से कमजोर कैसे हो? खाना ठीक से नहीं खाती?

ऋतू: नहीं तो... मैं तो ठीक से खाती-पीती हूँ!

मैं: और ये ओर्गास्म???

ऋतू: जब भी हम प्यार कर रहे होते थे तो मैं सबसे पहले..... मतलब वो.... और आप हमेशा देर तक....तो मैं.... (ऋतू को ये कहने में बड़ा संकोच हो रहा था|)

मैं: पगली! छोड़ ये सब और खाना खा| (मैंने उसका ध्यान उन बातों से हटाया और खाने में लगा दिया|)

   खाना खा कर निकले तो बॉस का फ़ोन आ गया पर मैं चूँकि उस समय ड्राइव कर रहा था इसलिए फ़ोन नहीं उठा पाया| पहले मैंने ऋतू को हॉस्टल छोड़ा क्योंकि अब शाम के 4 बज रहे थे और मुझे ऑफिस पहुँचते-पहुँचते 5 बज गए| बॉस मुझे देखते ही जोर से चिल्लाया; "कहाँ था सारा दिन?" ये सुन कर मैडम अपने केबिन से बाहर आईं और मेरे बचाव में कूद पड़ी; "मुझे बता कर 'गए थे'! कजिन को एक्सीडेंट हो गया था और वो हॉस्पिटल में एडमिट था|" ये सुन कर बॉस ने मैडम को घूर के देखा और फिर बिना कुछ कहे अंदर केबिन में चला गया| मैं जानता था की आज तो मैडम को ये बहुत सुनाएगा इसलिए मैंने मैडम से दबे शब्दों में कहा; "mam! मेरी वजह से सर आपको बहुत डाटेंगे! आप को...." आगे मेरे कुछ भी कहने से पहले उन्होंने मेरी बात काट दी; "दोस्त को बचाना तो धर्म है!" इतना कह कर मैडम हँस पड़ी और मैं भी मुस्कुरा दिया| पर मन ही मन जानता था की mam को आज बहुत सुनना पड़ेगा|   

                    खेर काम तो करना ही था और मैडम को कम डाँट पड़े इसलिए थोड़ी देर बैठ कर काम निपटाया और घर पहुँच गया| घर आते ही ऋतू को फ़ोन किया और उसे याद दिलाया की उसने गोली खाई या नहीं?! मैंने तो फ़ोन में भी रिमाइंडर डाल लिया ताकि मैं कभी भूलूँ नहीं| अगले दिन जब ऋतू से शाम को मिला तो वो मुझे थोड़ी गुम-सुम लगी, पूछने पर उसने कहा;"क्या मैं ये बेबी कंसीव नहीं कर सकती?" ये सुन कर पहले तो सोचा की उसे झिड़क दूँ पर फिर सोचा की उसे ठीक से समझाता हूँ; "जान! अगर आप ये बेबी कंसीव करते हो तो हमें जल्दी शादी करनी पड़ेगी| जल्दी शादी करने के लिए हमें जल्दी भागना होगा, और भाग तो हम जाएंगे पर भाग कर जाएंगे कहाँ? कहाँ रहनेगे? क्या खाएंगे? सिर्फ प्यार से पेट नहीं भरता ना?" ये सुन कर ऋतू कुछ सोचने लगी और फिर बोली; "मैं भी जॉब करूँ?"

"जान! आप जॉब करोगे तो पढ़ाई कब करोगे? दोनों चीजें आप एक साथ मैनेज नहीं कर सकते और फिर आप जॉब करोगे तो हम रोज मिलेंगे कैसे? पर ऋतू का दिमाग इन सवालों के जवाब पहले ही सोच लिया था| "मैं पार्ट टाइम जॉब करुँगी, वो भी आप ही की कंपनी में|" ये सुन कर मैं हैरान हो गया और हैरानी से ऋतू को देखने लगा| "नहीं!!!" मैंने बस इतना ही जवाब दिया और बात को वहीँ दबा दिया| ऋतू ने भी डर के मारे आगे कुछ नहीं बोला| 
                    कुछ दिन और बीते, हम इसी तरह रोज मिलते पर जॉब के लिए ऋतू ने मुझसे आगे कोई बात नहीं की| संडे आया तो ऋतू ने जिद्द कर के मेरे घर आ गई, और आज तो वो बहुत जयदा ही खुश लग रही थी| आज वो पहली बार स्कर्ट पहन के आई थी और अपनी कुर्ती ऊपर उठा कर ऋतू ने मुझे अपनी नैवेल दिखाई| मेरी नजर उसकी नैवेल पर पड़ी तो मैं टकटकी बांधें उसी को देखता रहा| "क्या बात है आज तो मेरी जान मेरी जान लेने के इरादे से आई है!!!" ये कहते हुए मैंने ऋतू को अपनी छाती से चिपका लिया|
"वो प्रेगनेंसी वाले दिन के बाद मुझे तो लगा था की आप मुझे अब शादी तक छुओगे ही नहीं! आपको सडके करने को ही इतना सज-धज कर आई हूँ! सससस.....आ...आ...ह...नं... सच्ची कितने दिनों से आपके लिए प्यार के लिए तड़प रही थी|" ऋतू ने कसमसाते हुए कहा| 


"पागल! तुझे प्यार किये बिना तो मैं भी नहीं रह सकता! उस दिन जब तूने मुझे प्रेगनेंसी की बात बताई तो मैं मन ही मन सोच कर बैठा था की अब जल्दी ही तुझे भगा कर ले जाऊँ|" मैंने ऋतू को बाएं गाल को चूमते हुए कहा|

"सच्ची?" ऋतू ने खिलखिलाते हुए कहा|

"हाँ जी! बहुत प्यार करता हूँ मैं अपनी ऋतू से|" ये कहते हुए मैंने ऋतू के होंठों को चूम लिया|
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update 24

कुछ दिन और बीते, हम इसी तरह रोज मिलते पर जॉब के लिए ऋतू ने मुझसे आगे कोई बात नहीं की| संडे आया तो ऋतू ने जिद्द कर के मेरे घर आ गई, और आज तो वो बहुत जयदा ही खुश लग रही थी| आज वो पहली बार स्कर्ट पहन के आई थी और अपनी कुर्ती ऊपर उठा कर ऋतू ने मुझे अपनी नैवेल दिखाई| मेरी नजर उसकी नैवेल पर पड़ी तो मैं टकटकी बांधें उसी को देखता रहा| "क्या बात है आज तो मेरी जान मेरी जान लेने के इरादे से आई है!!!" ये कहते हुए मैंने ऋतू को अपनी छाती से चिपका लिया|
"वो प्रेगनेंसी वाले दिन के बाद मुझे तो लगा था की आप मुझे अब शादी तक छुओगे ही नहीं! आपको सडके करने को ही इतना सज-धज कर आई हूँ! सससस.....आ...आ...ह...नं... सच्ची कितने दिनों से आपके लिए प्यार के लिए तड़प रही थी|" ऋतू ने कसमसाते हुए कहा| 


"पागल! तुझे प्यार किये बिना तो मैं भी नहीं रह सकता! उस दिन जब तूने मुझे प्रेगनेंसी की बात बताई तो मैं मन ही मन सोच कर बैठा था की अब जल्दी ही तुझे भगा कर ले जाऊँ|" मैंने ऋतू को बाएं गाल को चूमते हुए कहा|

"सच्ची?" ऋतू ने खिलखिलाते हुए कहा|

"हाँ जी! बहुत प्यार करता हूँ मैं अपनी ऋतू से|" ये कहते हुए मैंने ऋतू के होंठों को चूम लिया|


अब आगे ......

मेरे होठों के सम्पर्क में आते ही ऋतू मचलने लगी और उसने अपने दोनों हाथों को मेरी गर्दन के पीछे ले जाके लॉक कर दिया| ऋतू उचक कर मेरे होठों को चूस रही थी और मुझे उसकी इस हरकत पर बहुत प्यार आ रहा था| मैंने उसे गोद में उठा लिया और किचन कॉउंटर पर ला कर बिठा दिया| ऋतू अब बिलकुल मेरे बराबर थी, और उसका मेरे होठों को चूमना जारी था| ऋतू के होंठ तो आज मुझ पर कुछ ज्यादा ही कहर डाल रहे थे, वो अपने होठों से मेरे होठों को बारी-बारी निचोड़ रही थी| इधर मेरे दिलों-दिमाग में उसकी नाभि ही छाई हुई थी| हाथ अपने आप ही उसकी नाभि के ऊपर थिरकने लगे थे| एक अजीब सी खुमारी थी, उस पर ऋतू की जिस्म की महक मुझे बहका रही थी| मैंने फिर से ऋतू को गोद में उठाया और पलंग पर ला कर लिटा दिया और खुद भी उसके ऊपर छा गया| अब मैंने अपने निचले होंठ और जीभ के साथ उसके    निचले होंठ को अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा| ऋतू की उँगलियाँ मेरे बालों में रास्ते बनाने लगी थी| निचले होंठ कर रस निचोड़ कर मैंने उसके ऊपर वाले होंठ को भी ऐसे ही निचोड़ा| मेरे हाथ अब नीचे आ कर उसके कुर्ते के ऊपर से स्तनों को दबाने लगे और उन्हें धीरे-धीरे मसलने लगे| मैं रुका और अपने घुटनों पर बैठ गया और ऋतू का हाथ पकड़ के उसे बिठाया| मुझे आगे उसे कुछ कहना नहीं पड़ा और उसने खुद ही अपना कुरता निकाल के फेंक दिया| मैं ने भी ताव में आकर अपनी टी-शर्ट निकाल फेंकी और फिर से ऋतू के ऊपर चढ़ गया और उसके होठों को अपने होठों में भींच कर चूसने लगा| ऋतू ने अपने दोनों हाथों से मेरा चेहरा थाम लिया और उसने भी अपनी जीभ से हमला कर दिया| मेरे मुँह में दाखिल हुई उसकी जीभ मेरी जीभ से लड़ने लगी| मैं ने अपने दाँतों से उसकी जीभ पकड़ ली और ऋतू थोड़ा छटपटाने लगी! इधर मेरी उँगलियों ने ऋतू की ब्रा के स्ट्राप को नीचे खिसका दिया| मैंने Kiss तोडा और ऋतू के कंधे को चूम लिया, जवाब में ऋतू ने अपनी उँगलियों को मेरे बालों में फँसा दिया| मैंने अपनी उँगलियों से अब उसकी ब्रा को उसके कंधे से होते हुए नीचे लाना शुरू कर दिया, ऋतू ने अपनी पकड़ मेरे बालों पर ढीली की और अगले ही पल उसकी ब्रा उसके सीने से अलग हो कर जमीन पर पड़ी थी| ऋतू मेरी आँखों में प्यास देख रही थी और मैं भी उसकी आँखों में वही प्यास देख रहा था| मैंने झुक कर ऋतू के बाएँ स्तन को अपने मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा| और ऋतू ने फिर से अपनी उँगलियाँ मेरे बालों में फँसा दीं| "काश...ससस..ससस...आ.आ..ननहहह....मैं आपको अपना दूध पिला सकती|" ये कहते हुए ऋतू सिसकारियां लेने लगी! उसकी टांगें भी हरकत करने लगीं और मेरी टांगों से लिपटने लगीं| ऋतू की बात आज मुझे बहुत उत्तेजक लग रही थी और मुझे ऐसा लगने लगा की वो मुझे जान-बुझ कर उत्तेजित कर रही है| "ससस...आ..आ..ह...ह....न...न... जानू! एक बार काट लो ना!" उसका कहना था और मैंने उसके बाएँ स्तन को काट लिया; "आआह्ह्ह्ह.....हहह...स..ससससस...ननन... न!!!!!" उसकी दर्द भरी कराह सुन मुझे और उत्तेजना हुई और मैंने ऋतू का दायाँ स्तन मुँह में भर लिया और उसे चूसने लगा| "ससस....आ...न.....ह... इसे भी...काटो....ना...प्लीज!" ये सुनते ही मैंने उसके दाएँ चूची को डाँट से काट लिया; "ईईई....माँ....आह....ससस...आ..न..हह...!!!" उसकी कराह निकली और मैं उत्तेजना से भर गया और वापस बाएँ स्तन की चूची को भी काट लिया| "ईईई...माँ......ाआनंनं.....ससस!!!! जानऊउउउउउउउ!!!!" ऋतू ने अपना दबाव मेरे सर पर और बढ़ा दिया|


अगले दस मिनट तक मैं यूँ ही कभी उसके एक स्तन को चूसता तो कभी दूसरे स्तन को! ऋतू ने धीरे-धीरे अपनी पकड़ मेरे सर पर से कम की तो मैं नीचे खिसका और उसकी नैवेल पर रूक गया| अपने होठों से मैंने उसकी नैवेल को चूमा, अगले ही पल मैंने अपनी जीभ उसमें डाल दी" इसके परिणाम स्वरुप ऋतू का पूरा जिस्म ऊपर की तरफ उठ गया| मैंने अपने निचले होंठ को उसकी नैवेल पर ऊपर से नीचे रगड़ना शुरू कर दिया| जीभ से मैं उसकी नैवेल को कुरेदने लगा, ऋतू से अब ये दोहरा हमला बर्दाश्त नहीं हो रहा था और वो छटपटाने लगी थी| पाँच मिनट तक उसकी नैवेल की चुसाई कर मैं और नीचे खिसका तो वहां तो अभी स्कर्ट का कब्ज़ा था| ऋतू ने तुरंत ही नाडा खोला और स्कर्ट अपनी गांड से नीचे खिसका दी और बाकी का काम मैंने किया| अब तो सिर्फ ऋतू की पैंटी बची थी| पैंटी देख कर मैं उस पर झुका और ऋतू की बुर को चूमना चाहा| पर ऋतू ने मुझे रोक दिया और अपनी पैंटी निकाल कर अपनी दोनों टांगें खोल दी| उसकी ये हरकत देख मेरे मुख पर मुस्कराहट छ गई और मुझे देख ऋतू ने अपने दोनों हाथों से अपने मुँह को ढक लिया| मैं झुक कर ऋतू की बुर को चूमने लगा तो उसने फिर मुझे रोक दिया, वो उठ के बैठी और मुझे अपने ऊपर खींच लिया| "आज मेरे जानू को और इंतजार नहीं करवाऊँगी|" इतना कह कर उसने मुझे अपने ऊपर से धकेल दिया और मुझे नीचे लिटा कर मेरे ऊपर चढ़ गई| अपनी चारों उँगलियों को ऋतू ने अपने थूक से चुपड़ा और अपनी बुर की फांकों को गीला करने लगी, अपनी दो उँगलियों से उसने अपनी ही थूक से अपनी बुर को अंदर से गीला कर दिया|    


उसने अपने थूक से सने हाथों से मेरा पाजामा बुरी तरह खींचना शुरू कर दिया, वासना उस पर इस कदर हावी थी की वो तो मेरा पाजामा फाड़ने को भी तैयार थी| आखिर पाजाम निकालते ही उसने उसे दोर्र फेंक दिया और मेरे कच्छे को देख कर बोली; "सच्ची आज के बाद मेरे होते हुए आप कभी कच्चा मत पहनना! नहीं तो मैं आपके सारे कच्छे फाड़ दूँगी!" ऋतू का उतावलापन आज साफ़ दिख रहा था| मेरा कच्छा तो उसने नोच कर निकाला और गुस्से से कमरे के दूसरे कोने में फेंक दिया, फिर से उसने अपना गाढ़ा थूक अपनी चारों उँगलियों पर निकाला और पहले मेरे लंड पर चुपड़ने लगी और फिर बाकी का अपनी बुर में घुसेड़ दिया! ऋतू का ये रूप देख कर मैं हैरान था!

ऋतू अब धीरे-धीरे अपनी बुर को मेरे लंड के ठीक ऊपर ले आई और धीरे-धीरे बुर को नीचे मेरे लंड पर दबाने लगी| मेरा सुपाड़ा पूरा अंदर जा चूका था और ऋतू के बुर की गर्मी मुझे अपने लंड पर महसूस होने लगी थी| मैं जानता था की अगर मैंने नीचे से जरा भी झटका मारा तो ऋतू की हालत दर्द के मारे खराब हो जायेगी, इसलिए में बिना हिले-डुले पड़ा रहा|

ऋतू ने बहुत हिम्मत दिखाई और धीरे-धीरे और नीचे आने लगी और मेरा लंड और अंदर जाने लगा| जब आधा लंड अंदर चला गया तो ऋतू रुक गई और मुझे लगा जैसे इसके आगे वो नहीं बढ़ेगी| ऋतू की चेहरे पर दर्द की लकीरें थीं और मुँह से दर्द भरी आह निकल रही थी| "स..आह...हम्म....मम...हह...आअह्ह्ह...अंह..!!!" ऋतू की बुर में उठ रहा दर्द उसकी जुबान से बाहर आ रहा था| जितना लंड अंदर गया था उतना ही अंदर लिए उसने ऊपर-नीचे होना शुरू कर दिया और मैं मन मार कर रह गया की वो मेरा पूरा लंड अंदर न ले सकी| अगले पांच मिनट तक ऋतू मेरे पेट पर अपना हाथ रख कर अपनी गांड ऊपर नीचे करती रही और मेरा बेचारा आधा लंड ही उसकी बुर की गर्मी की सिकाई पा रहा था| ऋतू को मेरे चेहरे से मेरी प्यास दिख रही थी और वो जानती थी की मेरा पूरा लंड उसकी बुर की गर्माहट चाहता है तो उसने ऊपर-नीचे होना रोक दिया और मेरे ऊपर लेट गई| "मुझे लगा की वो स्खलित हो गई है इसलिए आराम कर रही है पर उसने मुझे चौंकाते हुए पुछा; "जानू! आप ऐसे क्यों हो? अपना दर्द मुझसे क्यों छुपाते हो? मैं जानती हूँ की मैं आपको सेक्स में वो सुख नहीं दे पाती जो आप चाहते हो पर आपने कभी मुझसे क्यों कुछ नहीं कहा? आपके छूटने से पहले मैं स्खलित हो जाती हूँ पर आप हैं की.....क्या पराया समझते हो मुझे?"

ये सुन कर मुझे एहसास हुआ की मैं ऋतू से सेक्स में उसका पूरा साथ ना देने से थोड़ा दुखी था पर कभी उससे कहने की हिमायत नहीं जुटा पाया| "जान! ऐसा नहीं है! मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ, मेरे लिए तुम्हारे दिल का प्यार जर्रूरी है! सेक्स मेरे लिए मायने नहीं रखता! तुम्हें उससे ख़ुशी मिलती है और तुम्हें खुश देख मैं भी खुश हो लेता हूँ| बचपन से ले कर जब तक मैं घर पर था तब तक हम साथ खेले-खाये, बड़े हुए पर मेरे कॉलेज के वजह से मुझे शहर आना पड़ा और तब शायद तुमने खुद का ख़याल रखना बंद कर दिया| या शायद घर पर सब के तानों के दुःख के कारन तुम अच्छे से खाना नहीं खाती थी, इसीलिए तुम्हारा शरीर अंदर से कमजोर है और शायद इसीलिए तुम सेक्स में ज्यादा देर तक नहीं साथ दे पाती! पर उससे मेरा प्यार तुम्हारे लिए कभी कम नहीं हुआ! हाँ कुछ दिन पहले तुम ने मेरे दिल को बहुत ठेस पहुँचाई थी, पर उस किस्से के बाद तो हम और नजदीक ही आये हैं ना? मेरी बात सुन कर ऋतू मेरी आँखों में देखते हुए बोली; "मैं जानती हूँ आप मुझसे कितना प्यार करते हो और मेरे दिल को चोट न पहुंचे इसलिए आप ने मुझे कभी ये नहीं बताया| पर उस दिन जब में उस डॉक्टर के साथ अंदर गई चेक-अप के लिए तब मैंने उन्हें साड़ी बात बताई और उन्होंने मुझे कुछ बातें बताई! मैं वादा करती हूँ की आज के बाद मैं आपका पूरा साथ दूँगी!"


''आपको वादा करने की कोई जर्रूरत नहीं है!" ये सुन कर ऋतू मुस्कुराई और मेरे होठों को चूम लिया| मेरे लंड अभी भी आधा ऋतू की बुर में था और ऋतू ने धीरे-धीरे अपनी कमर को मेरे लंड पर दबाना शुरू किया| धीरे-धीरे ...धीरे-धीरे ...धीरे-धीरे ...धीरे-धीरे और आखिर में पूरा लंड ऋतू की बुर में समां गया| दर्द के मारे ऋतू की आँखें बंद हो चुकी थी और आँसूँ की धरा बह निकली थी|  "ससससस.....आअह्ह्ह्ह......मा....म...म.म.म.म....मममम.....ंन्न......ह्ह्ह्हह्ण....!!!" ऋतू का दर्द देख कर मन दुखी होने लगा था और लंड मियाँ अंदर बुर की गर्मी पा कर मचलने लगे थे| "जान! दर्द हो रहा है तो मत करो!" मैंने ऋतू से कहा पर उसने अपनी ऊँगली मेरे होठों पर रख दी| "ससस...आज...मेरे जानू.....को....सब....ससस...आअह्ह्ह..हहह्णणम्म्म....ममम...!!" ऋतू की दर्द भरी सिसकारियाँ अचानक ही मादक सिसकारियाँ बन चुकी थी| दो मिनट तक वो बिना हिले-डुले मेरे लंड को पानी बुर में भरे, आँखें मूंदे हुए बैठी रही| फिर उसने अपने दोनों हाथों को मेरी छाती पर रखा और अपनी कमर धीरे-धीरे ऊपर लाई, लंड का सुपाड़ा भर अंदर रहा गया था और फिर ऋतू धीरे-धीरे अपनी कमर को वापस नीचे लाई! दो मिनट में ही उसकी बुर ने रस छोड़ दिया, और वो गर्म-गर्म रस मेरे लंड को और भी गर्म करने लगा| ऋतू जैसे ही ऊपर उठी उसका रस बहता हुआ बाहर आया पर इस बार ऋतू रुकी नहीं और उसने लय-बद्ध तरीके से अपनी कमर ऊपर-नीचे करनी शुरू कर दी| 5 मिनट और फिर ऋतू उकड़ूँ हो कर बैठ गई और तेजी से उसने अपनी गांड ऊपर नीचे करने शुरू कर दी| अब तो मेरा लंड बड़ी आसानी से फिसलता हुआ उसकी बुर में अंदर-बाहर हो रहा था और ऋतू को भी बहुत जोश चढ़ आया था| अगले दस मिनट तक वो बिना रुके ऐसे ही ऊपर-नीचे करती रही और मेरी और मेरे लंड की हालत खराब कर दी| मेरे जिस्म में एक ऐठन आई और वही ऐठन ऋतू के जिस्म में भी आई और दोनों एक साथ अपना रस बहाने लगे, वो रस ऋतू के बुर में पहले भरा और काफी-कुछ रिस्ता हुआ बहार आने लगा|


ऋतू थक कर पस्त हो गई और मेरे ऊपर ही लुढ़क गई| हम दोनों की सांसें बहुत तेज थी, और लंड मियाँ अब भी ऋतू की बुर के अंदर फँसे पड़े थे| पाँच मिनट के बाद जब दोनों की सांसें सामान हुई तो आज मेरे चेहरे की संतुष्टि देख ऋतू को खुद पर गर्व होने लगा| मैंने करवट ले कर उसे अपने ऊपर से उतारा और अपनी बगल में लिटा दिया, इसी बीच मेरा लंड भी बहार आया| ऋतू की बुर से चम्मच भर गाढ़ा तरल बहंता हुआ बाहर आया जिसे देख कर मुझे बहुत आनंद आया| मैं वापस ऋतू की बगल में लेट गया, ऋतू ने मेरी तरफ करवट की और अपनी बायीँ टांग उठा कर मेरे लंड पर रख दी| वो अब भी उस गाढ़े तरल से अनजान थी!
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